नई दिल्ली, 23 अक्टूबर: दिल्ली हाई कोर्ट ने शुक्रवार को ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की अध्यक्ष नेहा बोरा की वह याचिका खारिज कर दी, जिसमें उन्होंने दिल्ली पुलिस के 10,000 रुपये के पीस बॉन्ड वाले नोटिस को चुनौती दी थी। अदालत ने उन्हें स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) के सामने पेश होने का निर्देश दिया है।
यह निर्णय यह तय करने का अधिकार मजिस्ट्रेट के विवेक पर छोड़ दिया गया है कि बॉनड अब भरवाया जाए या बाद में। यह खबर सबसे पहले
मामला किस धारा से जुड़ा है?
दिल्ली पुलिस ने 17 अक्टूबर को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 126 के तहत नेहा बोरा को नोटिस भेजा था। इसमें उनसे 19 अक्टूबर को SEM के सामने पेश होने को कहा गया था। धारा 126 के तहत मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति से शांति बनाए रखने का मुचलका भरवा सकता है, जिसके बारे में उसके पास विश्वसनीय जानकारी हो कि वह सार्वजनिक व्यवस्था में खलल डाल सकता है।
नोटिस में नेहा बोरा से 10,000 रुपये का व्यक्तिगत बॉन्ड और एक जमानतदार की शर्त रखी गई थी। उन्हें 16 अक्टूबर को 'लहरा दो तिरंगा' मार्च में शामिल होने जाते समय एहतियाती हिरासत में लिया गया था और 17 अक्टूबर को रिहा किया गया।
अदालत में क्या दलीलें रखी गईं?
नेहा बोरा की ओर से वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने तर्क दिया कि SEM ने नोटिस जारी करते समय अपने विवेक का इस्तेमाल नहीं किया और नोटिस बिना उचित विचार के कहीं से कॉपी-पेस्ट कर दिया गया। उन्होंने पुलिस के उस तर्क का भी जिक्र किया, जिसमें कहा गया था कि नेहा बोरा ने बिना अनुमति के राष्ट्रीय ध्वज फहराया था।
सवाल यह है कि क्या इस नोटिस में कोई दम है? हमें राष्ट्रीय ध्वज फहराने के लिए किसी अनुमति की जरूरत नहीं है। उन्हें (पुलिस को) कानून की क्लास लेने की जरूरत है।
यह बयान उन्होंने अदालत में दिया था। वकील का यह तर्क उस बड़े सवाल से जुड़ता है, जिस पर भारतीय नागरिक समाज में बहस छिड़ी हुई है: क्या तिरंगा फहराने के लिए किसी अनुमति की जरूरत होती है? हमारी संवैधानिक परंपरा में राष्ट्रीय ध्वज हर नागरिक का गौरव है, और उसे फहराना किसी अनुमति पर निर्भर नहीं है।
दूसरी ओर, दिल्ली पुलिस की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने याचिका की स्वीकार्यता पर आपत्ति जताई। उनका कहना था कि SEM ने नोटिस जारी करते समय पर्याप्त सामग्री पर विचार किया था और संबंधित अधिकारी के पास जरूरी आधार मौजूद थे।
विरोध प्रदर्शनों का संदर्भ क्या है?
नेहा बोरा चुनाव आयोग के वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में कथित अनियमितताओं के खिलाफ हुए प्रदर्शनों में सक्रिय रही हैं। उनकी याचिका में पुलिस के नोटिस को रद्द करने और उनके खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई न होने का निर्देश देने की मांग की गई थी।
यह मामला केवल एक व्यक्ति की कानूनी लड़ाई नहीं है। यह उस असंतुलन की ओर इशारा करता है, जिसमें एक ओर देश की न्यायिक प्रक्रिया है और दूसरी ओर नागरिक अधिकारों की अभिव्यक्ति। अशोक के काल में भी राजा और प्रजा के बीच संवाद की परंपरा थी। आज के लोकतंत्र में वह संवाद अदालतों के माध्यम से चलता है, और दोनों पक्षों को सुनने का अवसर मिलता है। यही हमारी व्यवस्था की ताकत है।
आगे क्या होगा?
अब नेहा बोरा को SEM के सामने पेश होना होगा। मजिस्ट्रेट तय करेगा कि 10,000 रुपये का पीस बॉन्ड अभी भरवाया जाए या कुछ समय बाद। यह प्रक्रिया नियमित कानूनी मार्ग पर चलेगी।
यह मामला यह भी दिखाता है कि देश में जहां एक ओर विरोध का अधिकार संविधान की देन है, वहीं कानून व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। दोनों के बीच संतुलन ही एक स्वस्थ लोकतंत्र की नींव है। आने वाले दिनों में SEM का निर्णय इस मामले का अगला मोड़ तय करेगा।
सामान्य प्रश्न
पीस बॉन्ड क्या होता है?
पीस बॉन्ड यानी शांति बनाए रखने का मुचलका एक एहतियाती कानूनी कदम है। BNSS की धारा 126 के तहत मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति से यह बॉन्ड भरवा सकता है, जिसके बारे में उसे विश्वसनीय जानकारी हो कि वह शांति भंग कर सकता है।
नेहा बोरा पर क्या आरोप हैं?
दिल्ली पुलिस के नोटिस में कहा गया था कि उन्होंने बिना अनुमति के राष्ट्रीय ध्वज फहराया और जांच की अवधि में शांति बनाए रखने के लिए उनसे 10,000 रुपये का बॉन्ड भरने की मांग की गई।
दिल्ली हाई कोर्ट ने क्या फैसला सुनाया?
दिल्ली हाई कोर्ट ने 23 अक्टूबर को नेहा बोरा की याचिका खारिज कर दी और उन्हें SEM के सामने पेश होने का निर्देश दिया। बॉन्ड कब भरवाया जाएगा, यह मजिस्ट्रेट तय करेगा।
