नागपुर से जारी ताजा चर्चा में कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने 24 अक्टूबर 2026 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत की तारीफ करते हुए एक बड़ा प्रश्न उठाया कि क्या भारतीय RSS से मिलकर रहने का रास्ता निकाल सकते हैं। यह सवाल तब उठा, जब 101 वर्ष की आयु में संघ और भारत, दोनों एक ऐसे मोड़ पर खड़े हैं जो राजनीतिक भी है और सभ्यतागत भी।
नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, संघ का लहजा पहले से नरम हुआ है और उसका दायरा भी बढ़ा है, लेकिन संघ के पारिस्थितिकी तंत्र में मौजूद कुछ तत्व आज भी नफरत और भेदभाव को बढ़ावा दे रहे हैं। जैसे-जैसे विभिन्न संस्थाओं में RSS का प्रभाव बढ़ता है, धर्मनिरपेक्ष भारतीयों के सामने एक गंभीर दुविधा खड़ी हो गई है।
101 साल का संघ: परिवर्तन और निरंतरता के बीच
द हिंडू अखबार ने अपने विश्लेषण में इसे
संघ की यह यात्रा साधारण नहीं है। सन् 1925 में नागपुर से शुरू हुआ यह संगठन आज देश की सबसे बड़ी स्वयंसेवी संस्थाओं में एक है। शिक्षा, स्वास्थ्य, सेवा और सामाजिक क्षेत्रों में संघ से जुड़े संगठनों का जाल व्यापक है। थरूर का प्रश्न इसी व्यापकता को देखते हुए उठा है, क्योंकि जब कोई संगठन राज्य और समाज के इतने बड़े हिस्सों में घुसा हो, तो उससे पूरी तरह अलग रहना व्यावहारिक नहीं रह जाता।
मोहन भागवत ने क्या कहा?
विजयादशमी के मौके पर संघ प्रमुख मोहन भागवत के बयानों ने इस बहस को और गहराई दी है। सत्य हिंदी के अनुसार, भागवत ने सत्ता परिवर्तन को देश की समस्याओं का समाधान मानने पर सवाल उठाए और विदेशी शक्तियों के इरादों पर संकेत किए। उन्होंने कहा कि भारत की समस्याएं सत्ता बदलने से नहीं सुलझेंगी।
ईटीवी भारत की रिपोर्ट में भागवत का एक और बयान प्रमुखता से आया। उन्होंने नागपुर में विजयादशमी उत्सव पर कहा कि भारत में बांग्लादेश और फ्रांस जैसे हालात पैदा करने की कोशिश की जा रही है। यह टिप्पणी विरोध प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि में आई, जिस पर राजनीतिक घेराबंदी तेज हो गई है।
नवभारत लाइव के अनुसार, भागवत ने पश्चिम से चली आंधी कहकर देश को तोड़ने की साजिश का जिक्र किया और आंदोलनकारियों को आगाह किया। उन्होंने कप्तान स्मित की भी तारीफ की और कहा कि उन्होंने हिंदू स्वभाव को दिखाया।
थरूर का सवाल: सह-अस्तित्व का रास्ता?
शशि थरूर का रुख इस बात की तरफ इशारा करता है कि भारत की विविधता वाली सामाजिक वास्तविकता में कोई भी संगठन या विचारधारा दूसरे को पूरी तरह बाहर नहीं कर सकती। जब संघ का प्रभाव शिक्षा बोर्ड से लेकर प्रशासन तक फैला है, तो धर्मनिरपेक्ष नागरिक के लिए सवाल यह नहीं है कि वह RSS के संपर्क में आएगा या नहीं। सवाल यह है कि उसके साथ किस तरह रहा जाए।
यह बहस भारत की प्राचीन परंपरा से गहरे जुड़ी है। हमारी सभ्यता ने हमेशा संवाद और सहनशीलता को सर्वोच्च माना है। सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध के बाद विजय के अहंकार को त्यागकर धम्म का मार्ग चुना था। वह अध्ययन आज भी सिखाता है कि सच्ची शक्ति संघर्ष में नहीं, समन्वय में है। थरूर का प्रश्न भी अंततः इसी समन्वय की तलाश है।
नरम लहजे और सख्त आलोचना का विरोधाभास
संघ के वर्तमान नरम लहजे और उसके कुछ तत्वों की कथित घृणा भरी भाषा के बीच का विरोधाभास इस बहस का केंद्र बना हुआ है। आलोचकों का कहना है कि जब तक संघ की व्यापक परिवार में शामिल संगठनों की भाषा नहीं बदलेगी, तब तक थरूर जैसे नेताओं की प्रशंसा केवल सांकेतिक रह जाएगी।
दूसरी ओर, संघ के समर्थक इसे संगठन के आधुनिक युग के अनुकूल बदलाव का प्रमाण मानते हैं। उनका तर्क है कि भागवत के बयानों में राष्ट्रीय एकता और सामाजिक सद्भाव का बल दिया जाता है, जो देश के हित में है।
द हिंडू के विश्लेषण ने इसे
क्या देश की समस्याएं सत्ता परिवर्तन से सुलझेंगी?
भागवत का यह बयान कि देश की समस्याएं सत्ता परिवर्तन से नहीं सुलझेंगी, वर्तमान राजनीतिक माहौल में विपक्ष के लिए चुनौती भरा है। विपक्षी दल सड़कों पर सत्ता परिवर्तन की मांग कर रहे हैं, जबकि संघ प्रमुख इस दृष्टिकोण पर सवाल उठा रहे हैं। यह बहस आने वाले दिनों में और तीखी हो सकती है, क्योंकि देश के सामने आंतरिक एकता और वैश्विक दबाव दोनों की परीक्षा खड़ी है।
भारत के लिए यह समय असाधारण है। आर्थिक उत्थान, अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा और तकनीकी प्रगति के बीच देश की आत्मा पर भी सवाल उठ रहे हैं। ऐसे में संघ जैसे संगठन और थरूर जैसे नेता, दोनों की जिम्मेदारी है कि बहस का स्तर ऊंचा रखें। देश की सभ्यतागत एकता किसी एक विचारधारा की विजय से नहीं, बल्कि सभी धाराओं के सहज सम्मान से बचती है।
सामने क्या है?
आने वाले महीनों में यह बहस संघ की आंतरिक बैठकों और राजनीतिक घटनाक्रम के साथ और विकसित होगी। थरूर का प्रश्न अपने आप में उत्तर नहीं है, पर वह उस दिशा की ओर पहला कदम है जहां भारत अपनी विविधता में एकता का प्राचीन आदर्श आधुनिक राजनीति के साथ साझा कर सके।
सामान्य प्रश्न
शशि थरूर ने मोहन भागवत के बारे में क्या कहा?
नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, शशि थरूर ने मोहन भागवत की तारीफ करते हुए पूछा कि क्या भारतीय RSS से मिलकर रहने का रास्ता निकाल सकते हैं, क्योंकि संघ का प्रभाव देश की विभिन्न संस्थाओं में लगातार बढ़ रहा है।
RSS की आयु कितनी हो गई है?
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की आयु 101 वर्ष हो गई है। संघ और भारत, दोनों इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़े हैं जिसे द हिंडू ने राजनीतिक और सभ्यतागत चुनाव की दुविधा कहा है।
मोहन भागवत ने विजयादशमी पर मुख्य रूप से क्या बताया?
सत्य हिंदी और ईटीवी भारत के अनुसार, भागवत ने सत्ता परिवर्तन को समस्या का समाधान मानने पर सवाल उठाए और कहा कि भारत में बांग्लादेश और फ्रांस जैसे हालात बनाने की कोशिश हो रही है।
