नागपुर में 20 अक्टूबर 2026 को आयोजित विजयादशमी उत्सव में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने समाज में आत्मबोध और राष्ट्रीय एकता का संदेश दिया। यह कार्यक्रम संघ की शताब्दी वर्ष के समापन का प्रतीक बना, जिसमें शस्त्र पूजन की परंपरा भी निभाई गई।
दैनिक जागरण (Dainik Jagran) के अनुसार, संघ के 100 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में नागपुर के रेशिमबाग मैदान में आयोजित इस उत्सव के दौरान भागवत ने संत शिरोमणि रविदास, स्वामी श्रद्धानंद और स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती जैसे संतों और महापुरुषों के योगदान का स्मरण किया। उन्होंने कहा कि विपरीत परिस्थितियों में भी संतों ने स्वधर्म, भक्ति और सामाजिक समरसता की अलख जगाकर समाज को एकजुट रखा।
आत्मबोध क्यों आवश्यक है: भागवत के शब्दों में
भागवत ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि भारत की विविधता में एकता का आधार सनातन दर्शन और 'स्व' का बोध है। उन्होंने कहा कि जब तक समाज अपनी साझी राष्ट्रीय पहचान और अपनत्व के भाव को सर्वोपरि रखेगा, तब तक देश सशक्त, संगठित और आत्मनिर्भर बना रहेगा।
उन्होंने इस वर्ष को धर्म और समाज की रक्षा में बलिदान देने वाले महापुरुषों के स्मरण का भी समय बताया। आर्य समाज के संन्यासी, शिक्षाविद और स्वतंत्रता सेनानी स्वामी श्रद्धानंद के बलिदान के 100 वर्ष पूरे हुए हैं। ओडिशा में वनवासी बंधुओं की सेवा में जीवन समर्पित करने वाले स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की जन्म शताब्दी चल रही है। स्वदेशी मेलों के जरिए स्वाभिमान जगाने वाले राजनारायण बसु का भी यह 200वां वर्ष है।
संघ की शताब्दी के संदर्भ में भागवत ने कहा कि संघ पिछले 100 वर्षों से समाज में इसी आत्मबोध और 'स्व' की भावना को जगाने का कार्य कर रहा है। यही कारण है कि इन विभूतियों का स्मरण आवश्यक है।
'हम भारत के लोग': संविधान की प्रस्तावना पर जोर
सरसंघचालक ने अपने संबोधन में 'पंच परिवर्तन' का जिक्र किया, जिसमें सबसे प्रमुख आधार 'स्वबोध' और 'स्वदेशी' का आचरण बताया। उन्होंने कहा कि हमारे संविधान की प्रस्तावना में लिखा गया 'हम भारत के लोग' वास्तव में उसी आत्मबोध और भावनात्मक एकता का प्रतीक है।
भागवत ने आगे कहा कि यही वह आंतरिक सूत्र है, जिसने प्राचीन काल से तमाम विविधताओं के बावजूद भारत को एक देश, एक समाज और एक राष्ट्र के रूप में जोड़े रखा है। हमारे पूर्वजों ने संपूर्ण सृष्टि की एकता को अनुभव किया था और उसी के आधार पर समाज में परस्पर अपनेपन का व्यवहार स्थापित किया था।
उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि जब समाज इस एकता और अपनेपन के दर्शन को भूल गया, तब आपस में बंट गया और कमजोर होता चला गया। इसी फूट के कारण देश को सदियों की गुलामी झेलनी पड़ी। अमर उजाला की रिपोर्ट में भी भागवत का यह कथन उद्धृत है कि हम विभाजित होकर कमजोर हुए।
भागवत ने कहा कि अनगिनत बलिदानों और संघर्षों के बाद मिली स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए जरूरी है कि हम अपने उस भावनात्मक रिश्ते को फिर से समझें और जीवन में उतारें, जिसका निर्देश संविधान के नीति निर्देशक तत्वों में भी निहित है। आज की परिस्थितियों में देश को संगठित और सक्षम बनाने के लिए स्वतंत्रता संग्राम के दौर से भी अधिक तपस्या, समर्पण और सजगता की आवश्यकता है।
विविधता में एकता: सनातन परंपरा का दृष्टिकोण
भागवत ने कहा कि भारत प्राकृतिक बनावट, पंथ, प्रांत, जाति, भाषा, खानपान और रीति रिवाजों से भरी विशाल विविधता का देश है। इस विविधता को साथ लेकर आगे बढ़ने के लिए एक ऐसे व्यापक आधार की जरूरत है, जो सबको स्वीकार करे, सम्मान दे और सभी की सुरक्षा व मान मर्यादा सुनिश्चित करे।
उन्होंने कहा कि दुनिया की अन्य विचारधाराओं में ऐसा समावेशी दृष्टिकोण दुर्लभ है, लेकिन भारत की सनातन परंपरा में यह सत्य अनादि काल से रचा बसा है। यह कोई कोरी कल्पना या केवल किताबों में लिखी बात नहीं, बल्कि संतों और महापुरुषों द्वारा प्रत्यक्ष अनुभूत सत्य है।
हमारी परंपरा सिखाती है कि सृष्टि में विविधता स्वाभाविक और परिवर्तनशील है, जबकि संपूर्ण अस्तित्व के भीतर समाई एकता अटल और शाश्वत है। भागवत ने कहा कि मनुष्य जीवन का अंतिम ध्येय इसी एकता को पहचानकर संयम, त्याग और 'वसुधैव कुटुंबकम' के भाव से जीना है, जिससे स्थायी सुख मिलता है।
उन्होंने कहा कि यही ज्ञान वेदों, उपनिषदों, मंदिरों, मठों और गुरुद्वारों की शिक्षाओं में मिलता है। सनातन दृष्टिकोण यह भी सिखाता है कि बदलते समय के साथ जीवनशैली में जरूरी बदलाव अपनाए जाएं, लेकिन शाश्वत जीवन मूल्यों को हमेशा अडिग रखा जाए।
राष्ट्रीय भाव की सर्वोपरिता पर संदेश
भागवत ने कहा कि अपनी भाषा, जाति या पंथ के प्रति स्वाभाविक लगाव होना गलत नहीं है, लेकिन जब तक इन सभी पहचानों से ऊपर देश और साझी राष्ट्रीयता का भाव सबसे ऊपर रहा, तब तक भारत पूरे विश्व के लिए एक आदर्श राष्ट्र बना रहा।
उन्होंने कहा कि इतिहास साक्षी है कि जब भी हम इस व्यापक राष्ट्रीय भाव को भूले, हमारे बीच का अपनत्व खत्म हुआ, हम विभाजित और कमजोर हुए तथा भय और असुरक्षा से घिर गए। इसलिए आज समय की मांग है कि हम संकीर्ण दायरों से ऊपर उठकर इस साझी एकता को फिर से अपने आचरण में लाएं।
नागपुर में शस्त्र पूजन और उत्सव का आयोजन
आज तक के अनुसार, संघ की शताब्दी वर्ष के निष्ठांत के इस विजयादशमी आयोजन में भागवत ने रेशिमबाग मैदान में शस्त्र पूजन किया। नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार शहर में पथ संचलन की तैयारियां भी की गईं। विजयादशमी का यह पर्व संघ की स्थापना दिवस के रूप में भी जाना जाता है, क्योंकि डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने 1925 में इसी दिन नागपुर में संघ की स्थापना की थी।
इस वर्ष विजयादशमी का पर्व विशेष महत्व रखता है, क्योंकि यह संघ के 100 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित हो रहे समारोहों की परिणति है। पाठक इस पर्व की शुभकामनाओं और परंपराओं के बारे में हमारे
