वृंदावन, 5 नवंबर। बागेश्वर धाम सरकार के पीठाधीश्वर आचार्य धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के भगवान श्रीकृष्ण पर दिए गए बयान के समर्थन में गुरुवार को वृंदावन के राधाकांत मंदिर में संतों और धर्माचार्यों की बैठक हुई। बैठक में उपस्थित संतों ने कहा कि शास्त्री ने शास्त्रों में उल्लिखित बात ही कही है, फिर भी बैठक के बीच ही 'लिफाफे' के आरोपों पर धर्माचार्यों के बीच तीखी बहस छिड़ गई।
दैनिक जागरण (Dainik Jagran) की रिपोर्ट के अनुसार, ब्रज तीर्थ देवालय न्यास और धर्म रक्षा संघ ने संयुक्त रूप से महांत फूलडोल बिहारी दास की अध्यक्षता में यह बैठक आयोजित की। इसका उद्देश्य इंटरनेट मीडिया पर शास्त्री के विरोध में प्रसारित बयानों का विरोध करना था।
बयान पर विवाद और संतों की प्रतिक्रिया
आचार्य धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के श्रीकृष्ण संबंधी बयान पिछले कुछ दिनों से विवाद के केंद्र में है। मथुरा-वृंदावन से लेकर अयोध्या तक कई संतों ने उनके बयान पर नाराजगी जताई थी, जबकि लाइव हिंदुस्तान के अनुसार आध्यात्मिक गुरु अनिरुद्धाचार्य अब खुलकर उनके समर्थन में उतरे हैं। वहीं टाइम्स नाउ नवभारत की रिपोर्ट के अनुसार इस विवादित बयान के बाद अदालत तक आपराधिक मानहानि की शिकायत दायर की गई है।
बैठक में आचार्य मृदुलकांत शास्त्री ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण का त्रिभंगी स्वरूप सनातन धर्म की प्राचीन और दिव्य परंपरा का अंग है। इस अलौकिक स्वरूप का वर्णन भक्त कवियों, रसिक संतों और आचार्यों ने सदियों पहले किया है।
उन्होंने कहा, “किसी भक्त द्वारा आराध्य के स्वरूप का भावपूर्ण वर्णन करना अपमान नहीं है।”
बैठक की अध्यक्षता कर रहे महांत फूलडोल बिहारी दास ने कहा, “भगवान और भक्त के बीच प्रेम, वात्सल्य, सख्य तथा माधुर्य भाव की समृद्ध परंपरा है। जब तक किसी कथन के पीछे दुर्भावना न हो, तब तक उसे अनावश्यक विवाद नहीं बनाना चाहिए।”
'लिफाफा' किसका, विवाद किसका
बैठक का सबसे चर्चित क्षण वह था जब नंदगांव के सेवायत हरिमोहन गोस्वामी ने आरोप लगाया। उन्होंने कहा, “कई संत और कथावाचक अनर्गल बयान देते आए हैं। हमने विरोध किया तो हमें एक बड़े संत ने लिफाफा दिया। हमने लिफाफा यह कहकर लौटा दिया कि यह परंपरा वृंदावन वालों की है।”
इसी क्षण के बाद बैठक में आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया। बीच-बचाव में आए आचार्य मृदुलकांत शास्त्री ने सबको समझाकर स्थिति शांत की। तब जाकर संतों और धर्माचार्यों की सहमति बनी कि धीरेंद्र शास्त्री ने गलत बयान नहीं दिया और जो कुछ श्रीकृष्ण के बारे में कहा गया, वह शास्त्रों में उल्लिखित है।
ब्रज की रसिक परंपरा का आह्वान
महांत हरिशंकर दास नागा ने कहा, “हमारे रसिक संतों ने ठाकुरजी की बांकी चितवन, बांकी अदा और त्रिभंगी मुद्रा का बड़े प्रेम से वर्णन किया है।”
सौरभ गौड़ ने कहा कि धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री सनातन धर्म और हिंदू समाज को जागृत करने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं, इसलिए उनके बयान पर विवाद खड़ा करना उचित नहीं। आरके पांडे ने कहा कि ब्रजभूमि के कण-कण में श्रीकृष्ण का वास है और शास्त्री के बयान को इसी रसिक परंपरा के आलोक में समझने की जरूरत है। रमाकांत गोस्वामी, स्वामी देवानंद परमहंस और आनंद बल्लभ गोस्वामी ने भी समर्थन दिया।
बैठक में रोहित रिछारिया, विनय त्रिपाठी, आचार्य सुमंत कृष्ण शास्त्री, पंकज चतुर्वेदी, महांत सुंदर दास, महांत दशरथ दास, स्वामी अतुल कृष्ण दास, स्वामी रामदास, आचार्य अनमोल, राम अभिलाष मिश्रा, आचार्य संगम, महंत मोहिनी बिहारी शरण, आचार्य यदुनंदन, शैलेंद्र कृष्ण और संजय हरियाणा सहित कई धर्माचार्य उपस्थित रहे।
आस्था के विषय में संयम क्यों जरूरी है
यह प्रकरण एक बड़े प्रश्न को उठाता है: आस्था के विषयों पर बयानबाजी कहां तक उचित है? भारत की सदियों पुरानी परंपरा संवाद और सहिष्णुता की रही है। जिस भूमि पर रसिक संतों ने ठाकुरजी की छवि का बारीकी से वर्णन किया, वहीं आज सोशल मीडिया के युग में हर कथन तनाव का बीज बन जाता है। दैनिक भास्कर के अनुसार मथुरा की बैठक में यह निर्णय भी लिया गया कि साधु-संत और भागवत प्रवक्ता शास्त्री के समर्थन में एकजुट हैं और मंच से मर्यादा रखे जाने का आग्रह किया गया।
सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध के बाद जिस धम्म का प्रचार किया था, उसका मूल स्वर भी यही था: अपनी अपनी आस्था का सम्मान करो, दूसरों की आस्था का अपमान न करो। आज जब भारत की सांस्कृतिक एकता पर बार-बार परीक्षण हो रहे हैं, धर्माचार्यों की यह संयमित पहल प्रशंसनीय है।
यह विवाद यहीं थमा नहीं है। अनिरुद्धाचार्य के समर्थन के बाद दोनों पक्षों में बयानों का सिलसिला जारी है और अदालत में दायर शिकायत का अगला दौर अब देखा जाएगा।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
वृंदावन की बैठक कब और कहां हुई?
गुरुवार, 5 नवंबर को वृंदावन के राधाकांत मंदिर में ब्रज तीर्थ देवालय न्यास और धर्म रक्षा संघ की संयुक्त बैठक हुई, जिसकी अध्यक्षता महांत फूलडोल बिहारी दास ने की।
बैठक में 'लिफाफे' का विवाद क्यों छिड़ा?
नंदगांव के सेवायत हरिमोहन गोस्वामी ने आरोप लगाया कि एक बड़े संत ने उन्हें विरोध बंद करने के लिए लिफाफा दिया, जिसे उन्होंने लौटा दिया। इसी बयान के बाद बैठक में आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गया।
संतों ने धीरेंद्र शास्त्री के बयान पर क्या मान रखा?
बहुसंख्यक धर्माचार्यों ने कहा कि शास्त्री ने शास्त्रों में उल्लिखित बात कही है और श्रीकृष्ण का त्रिभंगी स्वरूप ब्रज की रसिक परंपरा का हिस्सा है, इसलिए उनके बयान पर विवाद नहीं खड़ा किया जाना चाहिए।
