भारतीय जनता पार्टी के जनकल्याणकारी नेता लालकृष्ण आडवाणी अपने जीवन की राजनीतिक यात्रा के लिए देश के इतिहास में एक विशेष स्थान रखते हैं। भारत के पूर्व उप प्रधानमंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता आडवाणी का जन्म 8 नवंबर 1927 को सिंध प्रांत (अब पाकिस्तान) में हुआ था। उनके जन्म की 99वीं वर्षगांठ के मौके पर देश उनके राजनीतिक और आध्यात्मिक योगदान को याद कर रहा है।
न्यूज़18 इंडिया की एक विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, आडवाणी ने 14 वर्ष की आयु में ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के माध्यम से देश सेवा का मार्ग चुना था। 1947 में देश आज़ाद हुआ, लेकिन विभाजन के कारण उन्हें आज़ादी के कुछ ही घंटों बाद अपना घर छोड़कर भारत आना पड़ा। इस पीड़ा ने उन्हें राष्ट्र सेवा के प्रति और अधिक समर्पित कर दिया।
जब आडवाणी ने जनसंघ की अध्यक्षता से किया था इनकार
भाजपा की आधिकारिक वेबसाइट पर उल्लेख किया गया है कि फरवरी 1968 में जनसंघ के अध्यक्ष रहे अटल बिहारी वाजपेयी 1971 के आम चुनावों के बाद पद छोड़ना चाहते थे। उन्होंने आडवाणी को पार्टी का अध्यक्ष बनने का प्रस्ताव दिया।
आडवाणी ने बार-बार मना कर दिया। वे मानते थे कि वे अच्छे वक्ता नहीं हैं और जनसभा के सामने बोलने में घबराहट महसूस करते हैं, जबकि वाजपेयी अपनी वाकपटुता से जनता को आसानी से जोड़ लेते थे। अंततः अटलजी के लगातार समझाने पर दिसंबर 1972 में आडवाणी भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष बने।
भाजपा को राष्ट्रीय दल बनाने की रणनीति
1980 से 1990 के बीच आडवाणी ने भाजपा को राष्ट्रीय स्तर की पार्टी बनाने के लिए अपना पूरा समय समर्पित कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि 1984 में महज 2 सीटें पाने वाली पार्टी 1989 के लोकसभा चुनावों में 86 सीटों तक पहुंच गई। ख़बरहर न्यूज़ के अनुसार, इस उछाल ने भारतीय राजनीति की दिशा ही बदल दी।
1992 में पार्टी 121 सीटों पर पहुंची और 1996 में 161 सीटों के आंकड़े को छू लिया। आज़ादी के बाद पहली बार कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई और भाजपा संसद में सबसे अधिक संख्या वाली पार्टी बनकर उभरी। आडवाणी ने उस समय कहा था:
प्रकृति हमारे सामने खुशहाली और उनके मायने सामने लाकर रख देती है ताकि हम खुद उनमें से चुन सकें लेकिन मुझे भारी मात्रा में दोनों प्राप्त हुए हैं।
1990 की ऐतिहासिक राम रथयात्रा ने आडवाणी को जननेता के रूप में स्थापित किया। नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, इस यात्रा ने उन्हें देश के एक ऐसे नेता के रूप में प्रस्तुत किया जो सीधे जनता से जुड़ सकते हैं। प्रभात खबर के अनुसार, वाजपेयी और आडवाणी ने मिलकर भाजपा की नींव को मजबूत किया, जो आगे चलकर भारतीय राजनीति की मुख्यधारा बनी।
राष्ट्रहित और संसदीय मर्यादा के प्रतीक
आडवाणी ने लोकतंत्र, संविधान और संसदीय परंपराओं के प्रति गहरा सम्मान दिखाया। संसद में उनके भाषण तथ्यपरक, तार्किक और राष्ट्रहित से प्रेरित रहे। वे आंतरिक सुरक्षा और आतंकवाद के खिलाफ सख्त नीति के समर्थक थे। तीन दशकों तक सांसद रहने के बाद वे देश के गृह मंत्री बने और फिर 1999 से 2004 तक अटल बिहारी वाजपेयी की कैबिनेट में उप प्रधानमंत्री रहे।
2009 के लोकसभा चुनावों में वे नेता प्रतिपक्ष थे और उन्हें भाजपा का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार माना जा रहा था। अटल बिहारी वाजपेयी स्वयं उनके पक्ष में थे, यह उनकी स्वीकृति और वरिष्ठता का प्रमाण था।
आडवाणी का विरासत: मर्यादित राष्ट्रवाद और देशभक्ति
आडवाणी को उनके दौर का एक बुद्धिजीवी, कुशल और दृढ़ नेता माना जाता रहा है। जैसा कि अटलजी अक्सर कहते थे, आडवाणी ने कभी राष्ट्रवाद के मूलभूत विचार को नहीं त्यागा, फिर भी आवश्यकता के अनुसार लचीलापन दिखाया। यही उनकी राजनीतिक सूझबूझ और दूरदर्शिता थी।
हमारी सभ्यता कहती है कि सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति अंततः इतिहास में अमर हो जाता है। आडवाणी का जीवन इसी सिद्धांत का जीवंत उदाहरण है। सिंध से दिल्ली तक की उनकी यात्रा विभाजन की पीड़ा से उभरकर राष्ट्र सेवा में बदलने की कहानी है। उन्होंने व्यक्तिगत आकांक्षाओं को राष्ट्र के हित के आगे रखा, जो भारतीय मूल्यों की सबसे बड़ी विशेषता है।
निष्कर्ष: एक युग पुरुष का संदेश
लालकृष्ण आडवाणी की जीवन गाथा हमें सिखाती है कि देश की सेवा में व्यक्तिगत सुविधाओं का त्याग करना पड़ता है। चाहे 1972 में जनसंघ की अध्यक्षता का प्रस्ताव ठुकराना हो या 2009 में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में आगे न आना, उन्होंने हर कदम पर विनम्रता और मर्यादा बनाए रखी।
आज जब देश उनके योगदान को स्मरण कर रहा है, हमें उनके जीवन से प्रेरणा लेनी चाहिए: देश सर्वोपरि है, और इस सिद्धांत पर अटल रहना ही सच्ची राष्ट्र सेवा है। आडवाणी जी का यह जन्मदिन हमें एक बार फिर उन मूल्यों की याद दिलाता है जो हमारी सांस्कृतिक विरासत की आत्मा हैं।
संबंधित प्रश्न
लालकृष्ण आडवाणी का जन्म कब और कहां हुआ था?
आडवाणी का जन्म 8 नवंबर 1927 को सिंध प्रांत (अब पाकिस्तान) में हुआ था। विभाजन के बाद वे भारत आए और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के माध्यम से देश सेवा से जुड़े।
आडवाणी भाजपा के भीष्म पितामह क्यों कहलाते हैं?
भाजपा के कार्यकर्ता उन्हें भीष्म पितामह कहते हैं क्योंकि उन्होंने पार्टी को वैचारिक दिशा और जनाधार दोनों दिए। 1984 में 2 सीटों वाली पार्टी को उन्होंने 1996 तक 161 सीटों तक पहुंचाया।
आडवाणी ने सरकार में कौन से पद संभाले?
वे देश के गृह मंत्री रहे और 1999 से 2004 तक अटल बिहारी वाजपेयी की कैबिनेट में उप प्रधानमंत्री बने। इसके अलावा तीन दशकों तक वे संसद के सदस्य रहे।
आडवाणी ने जनसंघ की अध्यक्षता का प्रस्ताव क्यों ठुकराया था?
वे मानते थे कि वे अच्छे वक्ता नहीं हैं और जनसभा के सामने बोलने में घबराहट महसूस करते हैं। अटल बिहारी वाजपेयी के आग्रह पर दिसंबर 1972 में उन्होंने भारतीय जनसंघ की अध्यक्षता स्वीकार की।
