जनसंघ से मोदी युग तक: हिंदुत्व की यात्रा और 2029 का अगला पड़ाव
भारतीय जनता पार्टी की राजनीतिक यात्रा जनसंघ से शुरू होकर मोदी युग तक पहुंची है। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण और अनुच्छेद 370 के संवैधानिक बदलाव के बाद अब पार्टी के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि 2029 से पहले उसका अगला वैचारिक पड़ाव क्या होगा। काशी और मथुरा के विवाद अदालतों में लंबित हैं, लेकिन पार्टी का आधिकारिक रुख इन्हें अगला एजेंडा बताने से इनकार करता है।
जनसंघ की नींव और वैचारिक आधार
1951 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भारतीय जनसंघ की स्थापना की। राष्ट्रीय एकीकरण, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और जम्मू-कश्मीर का पूर्ण एकीकरण उस समय के प्रमुख मुद्दे थे। दीनदयाल उपाध्याय ने 1965 में 'एकात्म मानववाद' को पार्टी की वैचारिक आधारभूमि दी। यह दर्शन भारतीय सभ्यता की समग्रता पर आधारित था, जो व्यक्ति और समाज के बीच संतुलन स्थापित करता है।
1980 में बीजेपी का गठन और बदलाव की शुरुआत
1980 में जनता पार्टी से अलग होकर बीजेपी बनी और अटल बिहारी वाजपेयी पहले अध्यक्ष बने। पार्टी ने 'पंचनिष्ठा' के तहत राष्ट्रवाद, लोकतंत्र, गांधीवादी समाजवाद, सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता और मूल्य आधारित राजनीति को अपनी प्रतिबद्धता बताया। लेकिन 1984 के चुनाव में सिर्फ 2 सीटें मिलने के बाद पार्टी के भीतर वैचारिक दिशा को लेकर गंभीर मंथन शुरू हुआ।
आडवाणी की रथयात्रा और हिंदुत्व का विस्तार
राम जन्मभूमि आंदोलन बीजेपी के वैचारिक बदलाव का निर्णायक मोड़ साबित हुआ। जून 1989 में पालमपुर में पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने इस आंदोलन का समर्थन किया। लालकृष्ण आडवाणी की सोमनाथ से अयोध्या तक राम रथयात्रा ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया। 23 अक्टूबर 1990 को बिहार के समस्तीपुर में आडवाणी को हिरासत में लिया गया। दिसंबर 1992 में अयोध्या में विवादित ढांचा गिराए जाने के बाद भारतीय राजनीति का पूरा विमर्श बदल गया।
गठबंधन की राजनीति और सत्ता का अनुभव
1996 में बीजेपी 161 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी, लेकिन सरकार लंबे समय तक नहीं चल सकी। 1998 और 1999 में पार्टी 182 सीटों पर रही। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बीजेपी ने NDA के जरिए गठबंधन की राजनीति अपनाई। इस दौर में कई वैचारिक मुद्दे सरकार के साझा एजेंडे से बाहर रहे। सत्ता में बने रहना और सहयोगियों को साथ रखना उतना ही महत्वपूर्ण हो गया।
2014 के बाद मोदी युग का नया मॉडल
2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी ने 282 सीटों के साथ अपने दम पर बहुमत हासिल किया। 2019 में यह संख्या बढ़कर 303 हुई। 2024 में पार्टी 240 सीटों पर रही और NDA सहयोगियों पर निर्भर हुई। मोदी युग में बीजेपी का मॉडल केवल हिंदुत्व तक सीमित नहीं रहा। राष्ट्रवाद, कल्याणकारी योजनाएं, मजबूत नेतृत्व, इंफ्रास्ट्रक्चर और सांस्कृतिक पहचान को एक साथ जोड़ा गया।
अयोध्या, अनुच्छेद 370 और UCC का सफर
5 अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 के प्रावधानों में बदलाव किया गया। सुप्रीम कोर्ट के नवंबर 2019 के फैसले के बाद 5 फरवरी 2020 को श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन हुआ। CAA 2019 लागू हुआ और इसके नियम मार्च 2024 में अधिसूचित किए गए। बीजेपी ने 2024 के घोषणापत्र में UCC के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। राम मंदिर और अनुच्छेद 370 अब इतिहास का हिस्सा बन चुके हैं, जबकि UCC अभी भी पार्टी के घोषित एजेंडे में है।
क्या काशी और मथुरा अगला पड़ाव होंगे?
काशी के ज्ञानवापी और मथुरा के कृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह विवाद अदालतों में लंबित हैं। 1991 का Places of Worship Act धार्मिक स्थलों की स्थिति को 15 अगस्त 1947 के आधार पर बनाए रखने की व्यवस्था करता है। इसी कानून की संवैधानिक वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।
जुलाई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने इन मामलों में बातचीत के जरिए समाधान की संभावना तलाशने के लिए विशेष लोक अदालत की पहल की, लेकिन सहमति नहीं बनी। सितंबर 2026 में कृष्ण जन्मभूमि मामले की सुनवाई फिर टली। 2022 में तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने स्पष्ट कहा था कि पार्टी ने काशी-मथुरा को लेकर कोई राष्ट्रीय कार्यकारिणी प्रस्ताव पारित नहीं किया है। इन मामलों का फैसला संविधान और अदालतों के अनुसार होगा।
भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता का प्रतीक
यह पूरी यात्रा भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता को दर्शाती है। जहां एक ओर सांस्कृतिक पहचान की राजनीति है, वहीं दूसरी ओर संवैधानिक प्रक्रिया और न्यायिक समीक्षा की मजबूत परंपरा है। अयोध्या के बाद काशी और मथुरा राजनीतिक विमर्श में जरूर हैं, लेकिन उनका अगला पड़ाव फिलहाल अदालतों और कानूनी प्रक्रिया से तय होना है। भारत की ताकत उसकी विविधता में एकता है, और यही उसकी सभ्यतागत पहचान भी है।