गुलामी के निशान मिटाने का संकल्प: केरल से केरलम तक की सभ्यतागत यात्रा
भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री एवं राज्यसभा सांसद तरुण चुग ने राज्यसभा में 'केरल (नाम परिवर्तन) विधेयक, 2026' पर चर्चा में भाग लेते हुए विधेयक का पूर्ण समर्थन किया और सदन से इसे सर्वसम्मति से पारित करने का आग्रह किया। चुग ने इसे केवल एक राज्य के नाम में बदलाव नहीं, बल्कि आज़ाद भारत को औपनिवेशिक विरासत और गुलामी की निशानियों से मुक्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया।
नाम में क्या रखा है? यह सवाल गुलामी की मानसिकता का प्रतीक है
विपक्ष के कुछ सांसदों द्वारा 'नाम में क्या रखा है' पूछे जाने पर तरुण चुग ने कहा कि प्रश्न यह नहीं है कि नाम में क्या रखा है, प्रश्न यह है कि नाम में क्या-क्या रखा है। उन्होंने कहा कि किसी देश और समाज का नाम केवल अक्षरों का समूह नहीं होता, बल्कि उसके साथ ऐतिहासिक स्मृति, सांस्कृतिक चेतना और सभ्यतागत पहचान जुड़ी होती है। यदि गुलाम देश की पहचान को शासकों ने अपनी सुविधा से बदला या प्रचलित किया, तो स्वतंत्रता के बाद उस पहचान की समीक्षा करना गुलामी की मानसिकता से बाहर निकलने का स्वाभाविक कदम है।
औपनिवेशिक विरासत से मुक्ति: राष्ट्रीय आत्मसम्मान का विषय
चुग ने स्पष्ट किया कि यह इतिहास बदलने का प्रयास नहीं, बल्कि औपनिवेशिक शासन द्वारा थोपी गई पहचान से बाहर निकलकर अपनी मूल पहचान को पुनर्स्थापित करने का प्रयास है। उन्होंने कहा कि जिन लोगों ने हम पर शासन किया, जिन्होंने हमारे देश को गुलाम बनाया और हमारी सभ्यता एवं पहचान को दबाने का प्रयास किया, उनकी दी हुई गुलामी की निशानियों को माथे पर लगाकर घूमना नए आज़ाद भारत को स्वीकार नहीं है। स्वतंत्रता केवल सत्ता के हस्तांतरण का नाम नहीं है; राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ मानसिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता भी आवश्यक है।
आदि शंकराचार्य की भूमि: केरल की सभ्यतागत पहचान
तरुण चुग ने कहा कि केरल की धरती पूज्य आदि शंकराचार्य की जन्मभूमि है, जिन्होंने भारत की आध्यात्मिक एकता को मजबूत किया। कालडी से निकलकर आदि गुरु शंकराचार्य ने देश के चारों दिशाओं में भारत की एकात्म चेतना को स्थापित किया। यह वही भारत है जिसकी पहचान किसी औपनिवेशिक शक्ति ने नहीं बनाई, बल्कि हजारों वर्षों की सभ्यता ने बनाई है। इसलिए स्वतंत्र भारत का दायित्व है कि वह अपनी पहचान को विदेशी शासन की छाप से नहीं, बल्कि अपनी सभ्यतागत विरासत से परिभाषित करे।
विकास और राष्ट्रीय पहचान: विरोधी नहीं, पूरक
विपक्ष के इस आरोप पर कि नाम बदलने से विकास नहीं होगा, तरुण चुग ने कहा कि विकास और राष्ट्रीय पहचान एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। उन्होंने सदन में केंद्र सरकार द्वारा केरल को दी गई वित्तीय सहायता के आंकड़े रखते हुए कहा कि 2004 से 2014 के बीच यूपीए सरकार के दौरान केरल को कर हस्तांतरण के रूप में लगभग ₹46,300 करोड़ मिले, जबकि 2014 से 2024 के बीच यह राशि बढ़कर लगभग ₹1.57 लाख करोड़ हो गई। सहायता अनुदान के रूप में भी यूपीए के दशक में ₹25,630 करोड़ की तुलना में मोदी सरकार के कार्यकाल में ₹1,56,214 करोड़ दिए गए, जो 509 प्रतिशत की वृद्धि है।
विकसित भारत 2047: आर्थिक शक्ति और सांस्कृतिक आत्मविश्वास का संगम
तरुण चुग ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का विकसित भारत 2047 का संकल्प केवल आर्थिक विकास तक सीमित नहीं है। विकसित भारत का अर्थ ऐसा भारत है जो आर्थिक रूप से शक्तिशाली होने के साथ-साथ मानसिक रूप से भी स्वतंत्र, सांस्कृतिक रूप से आत्मविश्वासी और अपनी सभ्यतागत पहचान के प्रति गौरवान्वित हो। भारत आज विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज गति से आगे बढ़ रहा है, लेकिन इसके साथ यह भी आवश्यक है कि भारत औपनिवेशिक मानसिकता की अंतिम बची हुई परतों को भी पीछे छोड़े।
गुलामी के कलंक मिटाना: सच्चे अर्थों में स्वतंत्रता का सम्मान
चुग ने कहा कि आज़ादी का अर्थ केवल अंग्रेजों के चले जाने से नहीं है। आज़ादी का अर्थ यह भी है कि हम अपनी पहचान स्वयं तय करें, अपने इतिहास को स्वयं सम्मान दें और अपनी सभ्यता को किसी औपनिवेशिक दृष्टि से देखने के लिए बाध्य न हों। गुलामी की निशानियों को माथे पर लगाकर घूमना आज़ाद भारत की नियति नहीं हो सकती। गुलामी के कलंक मिटाना, औपनिवेशिक मानसिकता को पीछे छोड़ना और भारत को उसका आत्मसम्मान लौटाना ही सच्चे अर्थों में स्वतंत्रता का सम्मान है।
दलगत राजनीति से ऊपर उठकर ऐतिहासिक प्रयास का समर्थन करें
तरुण चुग ने सदन के सभी सदस्यों से आग्रह किया कि वे दलगत राजनीति से ऊपर उठकर इस ऐतिहासिक प्रयास का समर्थन करें। उन्होंने कहा कि केरल से केरलम केवल एक नाम की यात्रा नहीं, बल्कि गुलामी की मानसिकता से आत्मसम्मान की ओर, औपनिवेशिक विरासत से अपनी सभ्यतागत पहचान की ओर और पराधीनता की स्मृतियों से आत्मविश्वासी भारत की ओर बढ़ने का प्रतीक है।