MP के जंगलों में संकट: कैनाइन डिस्टेंपर वायरस से बाघों का अस्तित्व खतरे में
हमारी सभ्यता ने हमेशा वन्यजीवों को केवल जीव नहीं, बल्कि प्रकृति के संतुलन के रक्षक माना है। आज इसी विरासत की रक्षा एक गंभीर संकट से गुजर रही है। मध्य प्रदेश के जंगलों में कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (सीडीवी) एक अदृश्य खतरा बनकर उभरा है। कान्हा टाइगर रिजर्व से शुरू हुआ यह संक्रमण अब बांधवगढ़ तक पहुंच गया है, जिससे हमारे राष्ट्रीय पशु और अन्य वन्यजीवों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है।
कान्हा से बांधवगढ़ तक फैला संक्रमण
कान्हा टाइगर रिजर्व में इस वायरस के संक्रमण से अब तक छह बाघों की मौत हो चुकी है। वहीं, एक अन्य संक्रमित बाघ की पहचान होने के बाद उसे क्वारंटाइन कर निगरानी में रखा गया है। इसी बीच बांधवगढ़ से सटे नरसिंहपुर क्षेत्र के जंगलों में एक तेंदुआ भी संक्रमित पाया गया है, जिसका इलाज जबलपुर में चल रहा है। बांधवगढ़ क्षेत्र में एक घर के पास मृत मिले बाघ के मामले में भी संक्रमण की आशंका जताई जा रही है। हालात की गंभीरता को देखते हुए प्रदेश के सभी टाइगर रिजर्व को अलर्ट पर रखा गया है और वन विभाग ने बचाव अभियान तेज कर दिया है।
आवारा कुत्तों से वन्यजीवों तक पहुंचा खतरा
विशेषज्ञों के मुताबिक, कैनाइन डिस्टेंपर वायरस मुख्य रूप से कुत्तों में पाया जाता है, लेकिन यह बाघ, तेंदुआ और अन्य मांसाहारी वन्यजीवों को भी अपनी चपेट में ले सकता है। जंगलों के आसपास घूमने वाले आवारा कुत्ते इस संक्रमण के प्रमुख वाहक माने जा रहे हैं। यही वजह है कि वन विभाग ने पशुपालन विभाग के साथ मिलकर एक व्यापक टीकाकरण अभियान शुरू किया है।
कान्हा टाइगर रिजर्व के आसपास अब तक 84 गांवों में 12,734 पशुओं का टीकाकरण किया जा चुका है। वहीं, खापा और खटिया परिक्षेत्र में 404 कुत्तों को वैक्सीन लगाई गई है, ताकि संक्रमण की इस श्रृंखला को रोका जा सके। यह संयुक्त प्रयास हमारी उस परंपरा को दर्शाता है, जहां मानव और प्रकृति के बीच सहअस्तित्व को महत्व दिया जाता है।
इतिहास गवाह है, सतर्कता ही रक्षा है
प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) समिता राजौरा के अनुसार, यह बीमारी वन्यजीवों के लिए बिल्कुल नई नहीं है। पूर्व में भी बाघ और तेंदुए इस संक्रमण का शिकार हुए हैं, लेकिन उस समय मामलों की पहचान और निगरानी का तंत्र इतना विकसित नहीं था। अब विभाग सक्रिय रूप से संक्रमित वन्यजीवों की निगरानी कर रहा है और बचाव के उपायों को प्राथमिकता दे रहा है।
कान्हा टाइगर रिजर्व के पूर्व अनुसंधान अधिकारी डॉ. राकेश शुक्ला का कहना है कि वर्ष 2015-16 में भी कई बाघों और तेंदुओं की मौत इसी वायरस के कारण हुई थी। उन्होंने बताया कि यह संक्रमण कुछ हद तक कोविड-19 की तरह है, जिसका कोई निश्चित इलाज नहीं है। ऐसे में रोकथाम और सतर्कता ही सबसे प्रभावी उपाय हैं।
गिर का दर्द, अब मध्य प्रदेश की चुनौती
वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि कैनाइन डिस्टेंपर वायरस का खतरा केवल मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं है। वर्ष 2018 में गुजरात के गिर अभयारण्य में इसी संक्रमण के कारण 24 शेरों की मौत हो गई थी। यह घटना हमें याद दिलाती है कि प्रकृति के साथ लापरवाही कभी भारी पड़ सकती है। यही वजह है कि मध्य प्रदेश में इस वायरस के बढ़ते मामलों को गंभीरता से लिया जा रहा है।
वन विभाग का मानना है कि यदि समय रहते संक्रमण की रोकथाम नहीं की गई, तो यह प्रदेश के बाघ और तेंदुआ संरक्षण कार्यक्रमों के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। फिलहाल सभी संरक्षित क्षेत्रों में निगरानी बढ़ा दी गई है और वन्यजीवों के स्वास्थ्य पर विशेष नजर रखी जा रही है। हमारी सभ्यता ने वन और वन्यजीवों के साथ सद्भाव का मार्ग अपनाया है। आज जब हमारे जंगल इस महामारी जैसे संकट से जूझ रहे हैं, तो हमारी नैतिक जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। वन विभाग के प्रयासों के साथ हम सभी को भी जागरूक रहना होगा, ताकि हमारी इस अमूल्य प्राकृतिक विरासत की रक्षा हो सके।