मध्यपूर्वी संघर्ष में भारत की कूटनीति और वैश्विक शांति की चुनौती
वर्तमान में मध्यपूर्व में चल रहे संघर्ष ने वैश्विक राजनीति के समक्ष गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव ने न केवल क्षेत्रीय स्थिरता को प्रभावित किया है, बल्कि विश्व शांति के लिए भी चुनौती उत्पन्न की है।
युद्ध की राजनीति और वैश्विक प्रभाव
इतिहास साक्षी है कि राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए युद्ध का सहारा लिया जाता रहा है। आज का ईरान-इजरायल संघर्ष भी इसी परंपरा का हिस्सा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतान्याहू की नीतियों ने इस युद्ध को जन्म दिया है।
मुक्ति के नाम पर किए गए हमलों के पीछे वास्तविक राजनीतिक और आर्थिक हित छिपे हुए हैं। 1950 में चीन द्वारा तिब्बत पर कब्जे का उदाहरण इस बात को स्पष्ट करता है कि कैसे मुक्ति के नाम पर साम्राज्यवादी नीतियां अपनाई जाती हैं।
प्रतिरोध की शक्ति
अमेरिका और इजरायल को लगा था कि वे ईरान को आसानी से पराजित कर देंगे। सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामेनेई की हत्या के बाद युद्ध समाप्त होने की उम्मीद थी, परंतु ईरान ने अपना प्रतिरोध जारी रखा है।
कई सैन्य अधिकारियों और नेताओं की शहादत के बावजूद, ईरान की जनता एकजुट होकर संघर्ष का सामना कर रही है। तेल अवीव पर मिसाइल हमले और खाड़ी में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर आक्रमण इस बात के प्रमाण हैं कि प्रतिरोध की भावना अभी भी जीवित है।
मानवीय त्रासदी
गाजा पट्टी में हुई हिंसा और नागरिकों की मौत मानवता के लिए बड़ा संकट है। बड़ी संख्या में बच्चों और आम नागरिकों की मृत्यु के बावजूद दुनिया के कई देश इस मुद्दे पर मौन साधे हुए हैं। यह स्थिति अंतर्राष्ट्रीय न्याय और मानवाधिकारों के सिद्धांतों पर प्रश्नचिह्न लगाती है।
भारत की कूटनीतिक भूमिका
इस संकट में भारत की कूटनीतिक उपस्थिति कमजोर दिखाई दे रही है। एक उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में भारत से अपेक्षा की जाती है कि वह शांति स्थापना में सक्रिय भूमिका निभाए। फरवरी 2026 में प्रधानमंत्री मोदी के इजरायल दौरे के बाद क्षेत्रीय तनाव और बढ़ गया है।
भारत की प्राचीन परंपरा में अहिंसा और शांति के सिद्धांत निहित हैं। सम्राट अशोक के कलिंग युद्ध के बाद अहिंसा अपनाने का उदाहरण आज भी प्रासंगिक है। भारत को इस संकट में मध्यस्थता की भूमिका निभाकर वैश्विक शांति में योगदान देना चाहिए।
निष्कर्ष
वैश्विक शक्तियां अपने हितों के लिए युद्ध का सहारा ले रही हैं। जिन देशों ने ईरान को आसानी से पराजित करने की सोची थी, उन्हें कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। यह स्थिति दर्शाती है कि प्रतिरोध की भावना आसानी से समाप्त नहीं होती।
भारत को अपनी सांस्कृतिक विरासत के अनुरूप शांति और न्याय के सिद्धांतों को आगे बढ़ाना चाहिए। केवल संवाद और कूटनीति के माध्यम से ही स्थायी शांति स्थापित की जा सकती है।