व्यायाम में विविधता से मिलती है दीर्घायु की गारंटी: 30 वर्षीय शोध का महत्वपूर्ण निष्कर्ष
भारतीय संस्कृति में सदियों से कहा गया है कि "शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्" अर्थात् शरीर ही धर्म का पहला साधन है। आज आधुनिक विज्ञान भी इस प्राचीन सत्य की पुष्टि कर रहा है। हाल ही में प्रकाशित एक व्यापक अध्ययन ने यह सिद्ध किया है कि दीर्घायु प्राप्त करने के लिए केवल नियमित व्यायाम ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि व्यायाम में विविधता लाना आवश्यक है।
30 वर्षों के शोध का अद्भुत निष्कर्ष
हार्वर्ड विश्वविद्यालय और चीन की चोंगकिंग मेडिकल विश्वविद्यालय के संयुक्त अध्ययन में 1,11,300 से अधिक लोगों पर 30 वर्षों तक निरंतर शोध किया गया। 'ब्रिटिश मेडिकल जर्नल' में प्रकाशित इस अध्ययन के परिणाम चौंकाने वाले हैं।
शोध में शामिल सभी प्रतिभागी प्रारंभ में पूर्णतः स्वस्थ थे और उन्हें हृदय रोग, मधुमेह या कैंसर जैसी कोई गंभीर बीमारी नहीं थी। तीन दशकों तक इनकी शारीरिक गतिविधियों का बारीकी से अवलोकन किया गया।
विविधता ही है दीर्घायु की कुंजी
अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि जो व्यक्ति अपनी दैनिक दिनचर्या में विभिन्न प्रकार की शारीरिक गतिविधियों को सम्मिलित करते हैं, उनमें मृत्यु दर काफी कम पाई गई। यह भारतीय योग परंपरा के सिद्धांत से मेल खाता है, जहां आसन, प्राणायाम और ध्यान का संयोजन संपूर्ण स्वास्थ्य प्रदान करता है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, समय की मात्रा से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है गतिविधियों की गुणवत्ता और विविधता। एक ही प्रकार की कसरत में अटके रहने के बजाय, पैदल चलना, जॉगिंग, योग, तैराकी और अन्य खेलों का मिश्रण अपनाना चाहिए।
पुरुष और महिलाओं में गतिविधि के प्रकार
अध्ययन में दिलचस्प तथ्य यह सामने आया कि दोनों लिंगों में पैदल चलना सबसे सामान्य गतिविधि थी। हालांकि, पुरुषों में दौड़ना और जॉगिंग की प्रवृत्ति महिलाओं की तुलना में अधिक पाई गई।
भारतीय जीवनशैली के लिए संदेश
यह शोध हमारी प्राचीन भारतीय जीवनशैली की वैज्ञानिक पुष्टि करता है। हमारे पूर्वजों का जीवन प्राकृतिक रूप से विविधतापूर्ण था, कृषि कार्य, पशुपालन, योग और विभिन्न शारीरिक गतिविधियों का संयोजन उनके दैनिक जीवन का हिस्सा था।
आज की आधुनिक जीवनशैली में हमें सचेत रूप से इस विविधता को अपनाना होगा। केवल जिम जाना या केवल पार्क में टहलना पर्याप्त नहीं है। हमें योग, खेल, नृत्य, साइकिलिंग और अन्य गतिविधियों को अपने जीवन में संतुलित रूप से शामिल करना चाहिए।
यह शोध इस बात का प्रमाण है कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में भारतीय परंपरा और आधुनिक विज्ञान एक ही दिशा में इशारा कर रहे हैं। दीर्घायु और स्वस्थ जीवन के लिए संतुलन और विविधता ही मूलमंत्र है।