भारत पर पहला विदेशी आक्रमण: फारसी साम्राज्य का प्रवेश
भारतीय सभ्यता के गौरवशाली इतिहास में एक दुखद अध्याय है विदेशी आक्रमणों का। प्राचीन भारत की असीम संपत्ति और सांस्कृतिक समृद्धि ने इसे 'सोने की चिड़िया' बनाया, परंतु यही वैभव विदेशी आक्रांताओं के लिए आकर्षण का केंद्र भी बना।
भारत की प्राचीन समृद्धि
हमारी मातृभूमि सदियों से अपनी उपजाऊ भूमि, विशाल नदी तंत्र, स्वर्ण भंडार, मसालों की विविधता और कुशल शिल्पकारों के लिए विश्वप्रसिद्ध रही है। मंदिरों में संचित अपार संपत्ति और भारतीय कारीगरों की अद्वितीय कला ने विदेशी शक्तियों की लालसा को जगाया।
पहला संगठित विदेशी आक्रमण
इतिहासकारों के अनुसार, भारत पर पहला संगठित विदेशी आक्रमण फारसी अचमेनिद साम्राज्य द्वारा किया गया। लगभग 535 ईसा पूर्व में फारसी सम्राट साइरस महान ने भारत के उत्तर-पश्चिमी प्रांतों पर आक्रमण किया।
उस काल में भारत अनेक छोटे राज्यों में विभाजित था। एकीकृत केंद्रीय शक्ति के अभाव में सीमावर्ती क्षेत्रों की सुरक्षा कमजोर थी, जिसका फायदा उठाकर साइरस ने सिंधु नदी के पश्चिमी भागों को अपने साम्राज्य में मिला लिया।
दारियस का विस्तारवादी अभियान
साइरस के उत्तराधिकारी दारियस प्रथम ने भारत में फारसी प्रभाव को और गहरा किया। उसने सिंध और पंजाब के विस्तृत क्षेत्रों पर अधिकार स्थापित किया। दारियस को भारत से व्यवस्थित रूप से संपत्ति और संसाधन ले जाने वाला पहला विदेशी शासक माना जा सकता है।
भारत से फारस का शोषण
फारसी आक्रमण केवल सैन्य विजय तक सीमित नहीं रहा। इन्होंने भारत की आर्थिक और मानवीय संपदा का व्यापक दोहन किया:
आर्थिक शोषण: भारत के उत्तर-पश्चिमी प्रांत फारसी साम्राज्य के सबसे समृद्ध क्षेत्र बन गए। भारी मात्रा में स्वर्ण, रजत और कर फारस भेजा जाता था। भारत फारसी साम्राज्य को सर्वाधिक राजस्व प्रदान करने वाला प्रांत था।
मानव संसाधन का दुरुपयोग: भारतीय योद्धाओं को फारसी सेनाओं में भर्ती किया गया और उन्हें यूनान जैसे दूर के युद्धक्षेत्रों में भेजा गया।
प्रशासनिक ज्ञान का हस्तांतरण: भारत की उन्नत भूमि मापन प्रणाली और कर व्यवस्था को फारस ले जाया गया।
सभ्यतागत प्रभाव
इस आक्रमण के परिणामस्वरूप भारत और पश्चिमी देशों के मध्य व्यापारिक संपर्क बढ़े। भारतीय मसाले, सूती वस्त्र और रत्न फारस के माध्यम से अन्य देशों तक पहुंचे। परंतु यह आदान-प्रदान भारत के लिए असमान था, क्योंकि संपत्ति का मुख्य प्रवाह भारत से बाहर की ओर था।
यह ऐतिहासिक घटना हमें याद दिलाती है कि एकता और मजबूत केंद्रीय शासन के बिना किसी भी समृद्ध सभ्यता की सुरक्षा संकट में पड़ सकती है। आज के युग में भी यह सबक प्रासंगिक है जब हमें अपनी सांस्कृतिक और आर्थिक संप्रभुता की रक्षा करनी है।