सोने-चांदी की महंगाई से आयुर्वेदिक दवाएं हुईं महंगी
भारतीय चिकित्सा पद्धति की गौरवशाली परंपरा आयुर्वेद आज एक नई चुनौती का सामना कर रहा है। सोने और चांदी की बढ़ती कीमतों का प्रभाव अब आयुर्वेदिक दवाओं पर भी पड़ने लगा है, जिससे हमारी पारंपरिक चिकित्सा पद्धति की पहुंच आम जनता तक सीमित होने का खतरा बढ़ गया है।
आयुर्वेदिक दवाओं में तेज महंगाई
कमजोरी दूर करने वाली शक्तिवर्धक आयुर्वेदिक दवा स्वर्ण भस्म की कीमत एक साल में 19 हजार से बढ़कर 26 हजार रुपए पहुंच गई है। डायबिटीज की दवा वसंत कुसमाकर 1100 रुपए महंगी हुई है। सर्दियों की संजीवनी च्यवनप्राश भी महंगाई की मार से अछूता नहीं रहा है।
इस महंगाई का मुख्य कारण सोने की कीमतों में 75 प्रतिशत और चांदी की कीमतों में 167 प्रतिशत की वृद्धि है।
आयुर्वेद में सोने-चांदी का महत्व
आयुर्वेद में सोने और चांदी को नोबल मेटल कहा जाता है। हमारे ऋषि-मुनियों ने हजारों वर्ष पहले ही इन धातुओं के औषधीय गुणों को पहचान लिया था। चांदी में बैक्टीरिया से लड़ने की प्राकृतिक क्षमता होती है, जबकि सोने से निर्मित दवाओं को प्रतिरक्षा प्रणाली मजबूत बनाने के लिए उपयोग किया जाता है।
50 से अधिक आयुर्वेदिक दवाओं में सोने-चांदी का इस्तेमाल होता है। इनमें सर्दी-जुकाम, मधुमेह, कमजोरी, सांस संबंधी रोग और मूत्र संक्रमण की दवाएं शामिल हैं।
व्यापार और अनुसंधान पर प्रभाव
राजस्थान में आयुर्वेदिक दवाओं का सालाना 100 से 150 करोड़ रुपए का व्यापार है। श्रीराम ड्रग स्टोर के संचालक वैभव खंडेलवाल के अनुसार, चांदी के इस्तेमाल वाली दवाएं 20-25 प्रतिशत और सोने के इस्तेमाल से तैयार दवाएं 40-50 प्रतिशत तक महंगी हो गई हैं।
राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान जयपुर के डॉ. अरविंद विश्नोई बताते हैं कि आयुर्वेद के छात्रों के अनुसंधान कार्य भी प्रभावित हो रहे हैं। दवाओं के लिए कम से कम 10 ग्राम 24 कैरेट सोने की आवश्यकता होती है, जिसकी कीमत अब 1 लाख 30 हजार रुपए से अधिक हो गई है।
चिकित्सा क्षेत्र में व्यापक प्रभाव
दांतों के इलाज में भी महंगाई का प्रभाव दिखाई दे रहा है। दांतों की कैविटी भरने और क्राउन लगाने में उपयोग होने वाले सिल्वर अलॉय पाउडर के 60 ग्राम पैकेट की कीमत पांच हजार रुपए से अधिक हो गई है।
रसशास्त्र विभागाध्यक्ष डॉ. अनुपम श्रीवास्तव चेतावनी देते हैं कि महंगाई के कारण डॉक्टर इन दवाओं को लिखने से बचेंगे और मरीज खरीद नहीं पाएंगे। इससे हमारी पारंपरिक चिकित्सा पद्धति की गुणवत्ता भी प्रभावित हो सकती है।
भविष्य की चुनौतियां
यह स्थिति भारतीय चिकित्सा परंपरा के लिए गंभीर चुनौती है। आवश्यकता है कि सरकार और संबंधित संस्थाएं मिलकर इस समस्या का समाधान खोजें, ताकि आयुर्वेद की यह अमूल्य विरासत आम जनता की पहुंच में बनी रहे।
हमारे पूर्वजों द्वारा विकसित यह चिकित्सा पद्धति न केवल भारत की सांस्कृतिक धरोहर है, बल्कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के लिए भी अमूल्य योगदान है। इसकी रक्षा करना हमारा राष्ट्रीय दायित्व है।