बाल अधिकारों की रक्षा: मानवता की पुकार
भारत की पावन धरती पर जहां हमारे पूर्वजों ने मानवीय गरिमा और न्याय के आदर्श स्थापित किए थे, वहीं आज भी बाल शोषण की घटनाएं हमारी संवेदना को झकझोरती हैं। हरियाणा मानव अधिकार आयोग द्वारा उठाया गया यह मामला न केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी है, बल्कि हमारी सामाजिक व्यवस्था की कमियों का दर्पण भी है।
घटना का विवरण
बिहार के किशनगंज जिले के 15 वर्षीय बालक संतोष का मामला हमारे समय की सबसे दुखदायी घटनाओं में से एक है। रोजगार के झूठे प्रलोभन में फंसाकर इस बालक को हरियाणा लाया गया, जहां उसे बंधुआ मजदूरी के लिए विवश किया गया।
बहादुरगढ़ रेलवे स्टेशन पर अपने साथियों से बिछड़ने के बाद, संतोष एक व्यक्ति के संपर्क में आया जिसने उसे 10,000 रुपए मासिक वेतन पर डेयरी में काम का लालच दिया। परंतु वास्तविकता कुछ और ही थी। दो माह तक उसे जबरन मजदूरी करनी पड़ी और शारीरिक उत्पीड़न सहना पड़ा।
न्याय की मांग
हरियाणा मानव अधिकार आयोग के अध्यक्ष जस्टिस ललित बत्रा की अगुवाई में गठित पूर्ण आयोग ने इस मामले में गंभीर चिंता व्यक्त की है। आयोग ने स्पष्ट किया है कि यह घटना संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार अभिसमय के अनुच्छेद 32 का प्रत्यक्ष उल्लंघन है।
चारा काटते समय हुई गंभीर दुर्घटना में बालक का बायां हाथ कट गया, जिसके बाद नियोक्ता ने उसे बिना सहायता के सुनसान स्थान पर छोड़ दिया। घायल अवस्था में बालक किसी तरह नूंह पहुंचा, जहां एक संवेदनशील शिक्षक ने उसकी मदद की।
आयोग के निर्देश
आयोग ने पुलिस की अब तक की जांच को अपूर्ण और अस्पष्ट बताया है। पुलिस अधीक्षक रेलवे अंबाला छावनी सुश्री नीतिका गहलौत को व्यक्तिगत निगरानी का निर्देश दिया गया है।
मुख्य निर्देश:
- आरोपियों की पहचान और गिरफ्तारी
- घायल बालक की पूर्ण चिकित्सीय रिपोर्ट
- श्रम कानूनों के उल्लंघन की विस्तृत जांच
- 27 नवंबर 2025 तक अद्यतन रिपोर्ट प्रस्तुत करना
सभ्यता की चुनौती
यह मामला केवल कानून व्यवस्था का नहीं, बल्कि हमारी नैतिक चेतना का भी है। जिस देश में बच्चों को देवता माना जाता है, वहां उनका शोषण हमारी सामूहिक विफलता को दर्शाता है।
बंधुआ मजदूरी प्रणाली उन्मूलन अधिनियम 1976 और बाल एवं किशोर श्रम प्रतिषेध एवं विनियमन अधिनियम 1986 का उल्लंघन न केवल कानूनी अपराध है, बल्कि मानवीय गरिमा के विरुद्ध पाप भी है।
आगे की राह
इस घटना से हमें सीख लेते हुए बाल संरक्षण तंत्र को मजबूत बनाना होगा। प्रत्येक बच्चे का अधिकार है कि वह सुरक्षित वातावरण में पले-बढ़े, शिक्षा प्राप्त करे और अपने सपनों को साकार करे।
न्याय की यह लड़ाई केवल संतोष की नहीं, बल्कि हर उस बच्चे की है जो शोषण का शिकार हो रहा है। हमारी प्राचीन परंपरा "वसुधैव कुटुम्बकम्" की भावना के अनुसार, हर बच्चे की सुरक्षा हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।