27 अक्टूबर 2026 तक भारतीय वायदा बाजार में चांदी अपने जनवरी के ऑल-टाइम हाई से 54.10% नीचे आ चुकी है, जिससे जनवरी में 4,20,048 रुपये प्रति किलोग्राम पहुंचा भाव अब लगभग 1.92 लाख रुपये प्रति किलोग्राम पर उतर गया है. News18 India की रिपोर्ट के मुताबिक, वैश्विक बाजार में भी चांदी जनवरी के 121.64 डॉलर प्रति औंस के शिखर से गिरकर 23 अक्टूबर को 53.47 डॉलर और अब 52.76 डॉलर प्रति औंस पर आ चुकी है.
यह गिरावट किसी एक घटना का परिणाम नहीं है. वैश्विक आर्थिक दबाव, चीन की बदलती आयात-निर्यात स्थिति, यूरोप की सुस्त औद्योगिक मांग और सोलर उद्योग में चांदी की जगह तांबे की ओर बढ़ता रुझान, इन सबने मिलकर इस कीमती धातु की मांग की नींव हिला दी है.
गिरावट के पीछे के बड़े कारण
केडिया कमोडिटी के एमडी अजय केडिया के अनुसार, 2026 में चांदी में तेज उतार-चढ़ाव देखा गया है और अमेरिका-ईरान के बीच तनाव, कच्चे तेल की ऊंची कीमत और महंगाई की चिंता ने बाजार की चाल बिगाड़ दी है. महंगा कच्चा तेल सीधे तौर पर महंगाई बढ़ने की आशंका पैदा करता है, जिससे अमेरिकी फेडरल रिजर्व के ब्याज दरें बढ़ाने की संभावना तेज हो गई है.
सोना और चांदी कोई ब्याज नहीं देते, इसलिए दरों में वृद्धि की उम्मीद के चलते निवेशक अपना पैसा इन धातुओं से निकालकर ब्याज देने वाले सुरक्षित विकल्पों में लगा रहे हैं. केडिया ने बाजार में नकदी के संकट और अन्य संपत्तियों की कमजोरी को भी गिरावट का बड़ा कारण माना.
उनके अनुसार, शेयर बाजारों की कमजोरी और मार्च की शुरुआत में यूएई में प्रॉपर्टी ट्रांजैक्शन की संख्या में दर्ज 37% की गिरावट संकेत देती है कि निवेशकों के बीच नकदी का दबाव और सतर्कता बढ़ी है. हालांकि केडिया का यह भी कहना है कि इतनी बड़ी गिरावट को किसी एक कारण से जोड़कर देखना पूरी तरह सही नहीं होगा.
चीन के आंकड़ों ने बढ़ाई अनिश्चितता
दुनिया के सबसे बड़े धातु आयातक चीन से आए ताजा आंकड़ों ने व्यापारियों को पशोपेश में डाल दिया है. सितंबर में चीन में 99.99% शुद्धता वाली बिना गढ़ी चांदी का आयात 114.93 टन हुआ, जो अगस्त के मुकाबले 73.5% अधिक था. इसके विपरीत, सितंबर में चीन का चांदी निर्यात 309.77 टन रहा, जिसमें अगस्त की तुलना में 23.7% की भारी कमी आई.
जनवरी से सितंबर की कुल अवधि में चीन का कुल चांदी निर्यात पिछले साल की इसी अवधि से 8.2% नीचे चल रहा है. यह वैश्विक बाजार में आपूर्ति और मांग के असंतुलन को उजागर करता है. चीन की अर्थव्यवस्था पर निर्भरता हमेशा से ही वैश्विक कीमतों के लिए जोखिम रही है, और यह घटना उसी की एक और पुष्टि है.
यूरोप की सुस्त मांग और लंदन के वॉल्ट
यूरोप में औद्योगिक मांग लगातार सुस्त पड़ने का असर भी चांदी पर पड़ रहा है. लंदन बुलियन मार्केट एसोसिएशन (LBMA) के आंकड़ों के मुताबिक, 2026 की तीसरी तिमाही में लंदन के वॉल्ट में रखी चांदी की मात्रा 3.22% बढ़कर 28,985 टन हो गई.
सिल्वर इंस्टीट्यूट के वर्ल्ड सिल्वर सर्वे 2026 में पुष्टि की गई है कि साल 2026 के दौरान यूरोप की औद्योगिक मांग में 5% की गिरावट आने का अनुमान है. जब गोदाम भरते जाएं और फैक्ट्रियां कम खरीदें, तो कीमतों का दबाव स्वाभाविक है.
सोलर उद्योग का बड़ा संकेत
सबसे चौंकाने वाला संकेत चीन के सोलर पैनल उद्योग से आया है. LBMA की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, चीन की एक बड़ी सोलर पैनल निर्माता कंपनी ने चांदी के अत्यधिक महंगे भावों के चलते अपने उत्पादों में चांदी की जगह तांबा इस्तेमाल करने की बात कही है.
सोलर पैनल निर्माण को चांदी की औद्योगिक खपत का सबसे मजबूत स्तंभ माना जाता रहा है. यदि अन्य सोलर कंपनियां भी चांदी से किनारा करती हैं, तो मांग में जोरदार गिरावट आ सकती है.
क्या अब निवेश करना चाहिए?
इस प्रश्न पर अजय केडिया का स्पष्ट मानना है कि इतनी बड़ी गिरावट के बाद निवेशकों को चांदी से घबराकर भागने के बजाय धीरे-धीरे खरीदारी, यानी SIP मोड, पर विचार करना चाहिए. उनका तर्क है कि 50% से अधिक की गिरावट अपने आप में बहुत बड़ी होती है.
चांदी की कुल वैश्विक मांग का लगभग 50% हिस्सा औद्योगिक उपयोग से आता है, इसलिए लंबी अवधि में आपूर्ति की कमी कीमतों को सहारा दे सकती है. लेकिन भाव तुरंत आसमान छू लेंगे, ऐसा सोचना भी गलत होगा. केडिया ने वैश्विक बाजार में 50 डॉलर प्रति औंस के स्तर को बहुत अहम सपोर्ट माना है.
उनका अनुमान है कि यदि भूराजनीतिक तनाव का दबाव कम होता है, तो चांदी अगले धनतेरस तक 90 से 100 डॉलर प्रति औंस के दायरे में वापसी कर सकती है. हालांकि उन्होंने साफ किया है कि यह केवल विश्लेषणात्मक अनुमान है, कोई पक्की गारंटी नहीं.
मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज के मानव मोदी का मानना है कि अगले 6 से 12 महीनों में चांदी की चाल पूरी तरह अनिश्चित और उतार-चढ़ाव भरी रह सकती है. उनके मुताबिक, निकट भविष्य में चांदी 50 से 65 डॉलर प्रति औंस के सीमित दायरे में घूम सकती है, और जब तक इस दायरे से कोई ठोस ब्रेकआउट नहीं मिलता, अनिर्णय की स्थिति बनी रहेगी.
अन्य आउटलेट्स की रिपोर्ट भी इसी तस्वीर की पुष्टि करती हैं. आज तक के अनुसार, जनवरी के शिखर से चांदी अब 2,26,493 रुपये प्रति किलो सस्ती हो चुकी है. एशियानेट न्यूज़ हिंदी ने भी इसे चांदी के बुलबुले का फूटना कहा है. न्यूज़टक की रिपोर्ट में गुरुवार को 4 दिसंबर एक्सपायरी वाला चांदी वायदा 2,03,450 रुपये प्रति किलो पर दर्ज हुआ.
भारतीय संदर्भ में यह घटना एक पुरानी सीख दोहराती है: धन की असल कद्र उसकी चमक में नहीं, व्यवस्थित निवेश और धैर्य में है. जो ग्राहक धनतेरस पर लालच में आकर एक ही दिन महंगी चांदी खरीदते हैं, वही आज पछता रहे हैं. धीमे और समझदारी भरे निर्णय की यही परंपरा हमारी आर्थिक विवेकता की असली विरासत है.
सामान्य प्रश्न
चांदी अपने शिखर से कितनी गिरी है?
News18 India के अनुसार, भारतीय वायदा बाजार में चांदी जनवरी 2026 के ऑल-टाइम हाई 4,20,048 रुपये प्रति किलोग्राम से 27 अक्टूबर तक 54.10% नीचे आ चुकी है, यानी लगभग 1.92 लाख रुपये प्रति किलोग्राम पर.
चांदी के भाव गिरने के मुख्य कारण क्या हैं?
अमेरिका-ईरान तनाव, महंगा कच्चा तेल, फेडरल रिजर्व के ब्याज बढ़ाने की आशंका, नकदी का दबाव, चीन में बदलती आयात-निर्यात स्थिति, यूरोप की कमजोर औद्योगिक मांग और सोलर उद्योग में चांदी की जगह तांबे की ओर रुझान शामिल हैं.
क्या अब चांदी में निवेश करना ठीक है?
अजय केडिया की सलाह है कि निवेशक घबराकर न भागें और SIP मोड में धीरे-धीरे खरीदारी पर विचार करें. उनके अनुसार 50 डॉलर प्रति औंस अहम सपोर्ट है, लेकिन तुरंत तेजी की उम्मीद रखना ठीक नहीं.
