TMC महाटूट: 20 सांसदों की बगावत, दिल्ली में राजनीतिक उथलपुथल
पश्चिम बंगाल में सत्ता बदलने के बाद ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (TMC) अब दिल्ली में भी गंभीर संकट से गुजर रही है। सोमवार को दिल्ली में भाजपा के वरिष्ठ नेताओं और पश्चिम बंगाल के नए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की मौजूदगी में टीएमसी के बागी सांसदों की बैठकें हुईं, जिनके बाद अगले 24 घंटे में पार्टी विभाजन का औपचारिक एलान संभव है।
दिल्ली में टीएमसी के बागी खेमे की सरगर्मियां
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में भारतीय जनता पार्टी की जीत और शुभेंदु अधिकारी के मुख्यमंत्री बनने के बाद तृणमूल कांग्रेस का आंतरिक संकट अब राजधानी दिल्ली तक पहुंच गया है। 8 जून 2026 का पूरा दिन दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में भारी उथलपुथल का गवाह बना। एक तरफ टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में विपक्षी इंडिया गठबंधन की बैठक में हिस्सा ले रहे थे, वहीं उससे कुछ ही दूरी पर टीएमसी के सांसदों के एक बड़े गुट द्वारा अलग मोर्चा बनाने की तैयारी चल रही थी।
देर शाम तक हालात यह रहे कि पश्चिम बंगाल के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी खुद दिल्ली में टीएमसी की सांसद शताब्दी रॉय के आवास पर पहुंच गए। उनके साथ टीएमसी के कई अन्य सांसद जैसे बापी हालदार, अबू ताहेर खान और असित कुमार माल भी वहां मौजूद थे। इस हलचल ने संकेत दे दिया है कि अगले 24 घंटे टीएमसी के राष्ट्रीय वजूद के लिए निर्णायक साबित होंगे।
केंद्रीय मंत्री के आवास पर पहली बैठक
सोमवार दोपहर की शुरुआत महत्वपूर्ण रही, जब केंद्रीय मंत्री और भाजपा के पश्चिम बंगाल प्रभारी भूपेंद्र यादव के दिल्ली आवास पर टीएमसी के बागी लोकसभा सांसदों का जमावड़ा हुआ। इस बैठक में हावड़ा के सांसद प्रसून बनर्जी, बांकुड़ा के सांसद अनूप चक्रवर्ती, कूचबिहार के सांसद जगदीश चंद्र बर्मा बसूनिया, बोलपुर के सांसद असित कुमार माल, बीरभूम की सांसद शताब्दी रॉय, झाड़ग्राम के सांसद कालीपद सोरेन और बर्धमान पूर्व की सांसद शर्मिला सरकार जैसे प्रमुख चेहरे शामिल हुए।
संख्या बल का दावा
बैठक के बाद यह जानकारी सामने आई कि लोकसभा में टीएमसी के कुल 29 सांसदों में से 20 सांसदों ने ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व के खिलाफ खुली बगावत कर दी है। ये सांसद संसद में एक अलग गुट बनाकर केंद्र की एनडीए सरकार को समर्थन देने की योजना बना रहे हैं। इसके अलावा, टीएमसी के वरिष्ठ राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय, जिन्होंने हाल ही में पार्टी और उच्च सदन से इस्तीफा दिया था, वे भी इस मुहिम में शामिल दिखे।
शुभेंदु अधिकारी की मौजूदगी का महत्व
भूपेंद्र यादव के घर हुई बैठक के बाद राजनीतिक सरगर्मी तब और बढ़ गई जब मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी खुद इस मोर्चे में उतर आए। वे सीधे दिल्ली में बीरभूम से टीएमसी सांसद शताब्दी रॉय के सरकारी आवास पर पहुंचे। उनकी मौजूदगी यह दर्शाती है कि भाजपा इस दलबदल को पूरी तरह कानूनी रूप से सुरक्षित करना चाहती है, ताकि दलबदल विरोधी कानून के प्रावधानों के भीतर रहकर यह प्रक्रिया पूरी हो सके।
शताब्दी रॉय की भूमिका: कानूनी चाल या लोकतांत्रिक परिवर्तन?
शताब्दी रॉय कागजों पर अभी भी लोकसभा में टीएमसी की चीफ व्हिप हैं। यदि वे 20 बागी सांसदों के हस्ताक्षरों के साथ लोकसभा अध्यक्ष को पत्र सौंपती हैं, तो दलबदल विरोधी कानून के तहत दोतिहाई का आंकड़ा पार होने के कारण किसी की सदस्यता नहीं जाएगी और बागी गुट को अलग मान्यता मिल जाएगी। यह संविधान के दसवें अनुसूची का वह प्रावधान है जो जनता के प्रतिनिधियों को अपनी राजनीतिक वफादारी बदलने का वैधानिक मार्ग प्रदान करता है।
शताब्दी रॉय के आवास पर शुभेंदु अधिकारी की मौजूदगी यह दर्शाती है कि भाजपा इस दलबदल को पूरी तरह कानूनी रूप से सुरक्षित करना चाहती है।
लोकतंत्र का अपना नियम: परिवर्तन की अनिवार्यता
भारतीय राजनीति में जनता का फैसला सर्वोपरि होता है। पश्चिम बंगाल की जनता ने विधानसभा चुनावों में अपना जनादेश दिया और सत्ता परिवर्तन हुआ। अब जब संसदीय स्तर पर भी प्रतिनिधियों का एक बड़ा हिस्सा अपनी राजनीतिक दिशा बदल रहा है, तो यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया का स्वाभाविक अंग है। इतिहास गवाह है कि जब भी किसी राजनीतिक शक्ति के भीतर जनता की आवाज से टकराव होता है, तो परिवर्तन अनिवार्य हो जाता है। धर्म और न्याय के मार्ग पर चलने वाले अशोक के सिद्धांतों की भांति, राजनीतिक नेतृत्व को भी जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए।
सोमवार को पूरे दिन की घटनाओं से यह स्पष्ट है कि ममता बनर्जी का राष्ट्रीय प्रभाव कमजोर हो चुका है। पश्चिम बंगाल विधानसभा में करीब 60 विधायकों के बागी होने और रीताभ्रता बनर्जी को नया नेता चुने जाने के ठीक एक हफ्ते बाद सांसदों का यह विच्छेदन टीएमसी के लिए एक गंभीर चुनौती है। टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने सोशल मीडिया पर बहरामपुर के सांसद यूसुफ पठान को लेकर भी दावा किया कि वे अमित शाह के बुलावे पर दिल्ली आ रहे हैं। हालांकि, इन बयानों के बीच तथ्य यही है कि अगले 24 घंटों के भीतर लोकसभा अध्यक्ष को पत्र सौंपकर टीएमसी के दोतिहाई सांसद राष्ट्रीय स्तर पर बड़ा निर्णायक कदम उठाने जा रहे हैं।
भारतीय लोकतंत्र की यह धरती हमेशा से बदलाव की गतिशीलता को अपनाती रही है। आज भी संसद के भीतर जो राजनीतिक पुनर्गठन हो रहा है, वह इसी लोकतांत्रिक परंपरा की अगली कड़ी है। अंततः, जनता का फैसला ही सर्वोपरि है।