बाबा बकाला साहिब में रक्खड़ पुन्नेया मेला: आस्था, इतिहास और सियासत का अद्भुत संगम
पंजाब के बाबा बकाला साहिब में रक्षाबंधन के पावन अवसर पर लगने वाला ऐतिहासिक रक्खड़ पुन्नेया मेला इस बार भी आस्था, इतिहास और परंपरा का अनूठा संगम बनकर उभरा है। नौवीं पातशाही श्री गुरु तेग बहादुर जी की पावन तपस्थली पर श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा है, और गुरुद्वारा साहिब रंग-बिरंगी रोशनियों से जगमगा उठा है। यह मेला न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक समरसता का जीवंत प्रतीक भी है।
बाबा बकाला साहिब का आध्यात्मिक महत्व क्या है?
बाबा बकाला साहिब का इतिहास श्री गुरु तेग बहादुर जी से गहराई से जुड़ा हुआ है। धार्मिक इतिहास के अनुसार, गुरु साहिब ने यहां एक भोरे (तहखाने) के अंदर रहकर पूरे 26 वर्ष, 9 महीने और 13 दिन तक कठोर तपस्या की थी। यही कारण है कि यह स्थान सिख धर्म में विशेष आध्यात्मिक महत्व रखता है। गुरु साहिब की तपस्थली होने के कारण यहां सालभर श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है, लेकिन साचा गुरु लाधो रे दिवस और रक्खड़ पुन्नेया के अवसर पर श्रद्धालुओं की संख्या कई गुना बढ़ जाती है। संगत गुरु घर में नतमस्तक होकर अरदास करती है और गुरबाणी का श्रवण करती है।
तीन दिवसीय मेले में क्या-क्या होता है?
रक्षाबंधन के अवसर पर बाबा बकाला साहिब में लगने वाला यह ऐतिहासिक मेला तीन दिनों तक चलता है। रक्षाबंधन से एक दिन पहले मेले की शुरुआत होती है और एक दिन बाद तक धार्मिक गतिविधियां जारी रहती हैं। इस दौरान गुरुद्वारा साहिब में विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। दूर-दराज से आने वाली संगत के लिए विभिन्न स्थानों पर लंगर और छबील भी लगाए जाते हैं। मेले के चलते बाबा बकाला साहिब और आसपास के क्षेत्र में बाजार भी सज गए हैं। दुकानों पर धार्मिक सामग्री, खिलौने, खान-पान और अन्य सामान की स्टालें लगाई गई हैं। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक हर वर्ग में मेले को लेकर उत्साह देखने को मिल रहा है।
राखड़ पुन्निया पर क्यों गरमाता है सियासी पारा?
बाबा बकाला साहिब का राखड़ पुन्निया मेला धार्मिक महत्व के साथ-साथ राजनीतिक गतिविधियों के लिए भी विशेष रूप से जाना जाता है। रक्षाबंधन वाले दिन विभिन्न राजनीतिक पार्टियों की ओर से यहां राजनीतिक कांफ्रेंस आयोजित की जाती हैं। इन कांफ्रेंसों में राज्य और राष्ट्रीय स्तर के नेता पहुंचकर अपने-अपने दल की नीतियों और उपलब्धियों को जनता के सामने रखते हैं। इस बार भी विभिन्न राजनीतिक दलों की ओर से कांफ्रेंसों की तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा रहा है। मेले में जहां एक तरफ गुरु घर में श्रद्धालुओं की आस्था का सैलाब उमड़ेगा, वहीं दूसरी तरफ राजनीतिक मंचों से नेताओं के भाषणों के कारण बाबा बकाला साहिब में सियासी माहौल भी गरमाएगा।
आस्था और भाईचारे का संदेश
बाबा बकाला साहिब का यह मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि क्षेत्र की समृद्ध धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा का प्रतीक भी है। अलग-अलग क्षेत्रों से आने वाली संगत यहां एक साथ गुरु घर में माथा टेकती है। मेले के दौरान धार्मिक कार्यक्रमों के साथ सेवा, लंगर और भाईचारे की भावना भी देखने को मिलती है। यह आयोजन भारतीय समाज की उस सदियों पुरानी परंपरा को जीवंत करता है, जहां आस्था की डोर सभी को एक सूत्र में बांधती है।
रक्खड़ पुन्नेया के अवसर पर बाबा बकाला साहिब में एक तरफ गुरु तेग बहादुर जी की तपस्थली के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की कतारें लगेंगी, तो दूसरी तरफ राजनीतिक दल अपने शक्ति प्रदर्शन के लिए मंच सजाएंगे। इस तरह आने वाले दिनों में बाबा बकाला साहिब में आस्था, इतिहास, परंपरा और सियासत का चारों का अनूठा संगम देखने को मिलेगा। यह मेला भारत की उस गौरवशाली विरासत का प्रतीक है, जहां धर्म और राजनीति, दोनों अपने-अपने दायरे में जनता की सेवा के लिए मौजूद रहते हैं।