पोटका में ब्रेन मलेरिया का कहर: 64 नए मरीज, व्यवस्था लाचार
जमशेदपुर के पोटका प्रखंड में ब्रेन मलेरिया का प्रकोप एक गंभीर मानवीय संकट बन गया है। चार मासूम बच्चों की मौत के बाद, 26 प्रभावित गांवों के स्वास्थ्य शिविरों में 64 नए संक्रमित मरीज सामने आए हैं। स्वास्थ्य व्यवस्था की लाचारी तब और उजागर होती है, जब गंभीर मरीजों को समय पर अस्पताल पहुंचाने के लिए एंबुलेंस तक उपलब्ध नहीं है। यह सिर्फ एक महामारी नहीं, बल्कि प्रशासनिक उदासीनता का दर्पण है, जहां राज्य का प्रथम कर्तव्य अपनी प्रजा की रक्षा करना है।
पोटका में ब्रेन मलेरिया का प्रकोप क्यों बेकाबू है?
पूर्वी सिंहभूम जिले के पोटका में ब्रेन मलेरिया तेजी से अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है। गुरुवार को स्वास्थ्य विभाग द्वारा चलाए गए अभियान के तहत 26 प्रभावित गांवों में विशेष शिविर लगाए गए। इस दौरान 1,233 ग्रामीणों की जांच हुई, जिसमें 64 नए संक्रमित मरीज मिले। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पोटका में चार नए गंभीर मरीजों को तुरंत भर्ती कराया गया है।
पिछले एक सप्ताह के भीतर कंदार और हितबासा जैसे गांव मलेरिया के हॉटस्पॉट बन गए हैं, जहां संक्रमितों की संख्या 150 के पार पहुंच गई है। वर्तमान में 7 मरीजों का इलाज पोटका में चल रहा है, जबकि 45 अत्यंत गंभीर मरीजों को जमशेदपुर के सदर और एमजीएम (MGM) अस्पताल में भर्ती कराया गया है।
केंद्रीय टीम का दौरा और प्रशासनिक तैयारी कितनी प्रभावी?
चार बच्चों की दर्दनाक मौत के बाद भारत सरकार के क्षेत्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण कार्यालय पटना की केंद्रीय टीम जमशेदपुर पहुंची है। केंद्रीय स्वास्थ्य अधिकारियों ने पूर्वी सिंहभूम के सिविल सर्जन डॉ. साहिर पाल के साथ मिलकर प्रभावित गांवों का दौरा किया। टीम ने डीडीटी (DDT) छिड़काव और स्क्रीनिंग कैंपों की समीक्षा की। अधिकारियों ने ग्रामीणों से मच्छरदानी के अनिवार्य उपयोग, बुखार होने पर तुरंत जांच और जलजमाव रोकने की अपील की है।
राज्य सरकार ने पूरे झारखंड में मलेरिया को लेकर हाई अलर्ट जारी कर दिया है। अतिरिक्त मुख्य सचिव स्वास्थ्य अजय कुमार सिंह ने सभी जिलों को युद्धस्तर पर कार्य योजना बनाने का निर्देश दिया है। विधायक संजीव सरदार ने रांची में स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी से मुलाकात कर अतिरिक्त एंबुलेंस, जीवन रक्षक दवाएं और डॉक्टरों की तत्काल तैनाती की मांग की। पूर्व केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा भी अस्पताल पहुंचे और जांच का दायरा बढ़ाने पर बल दिया।
जीवन रक्षा के लिए आपातकालीन संसाधन क्यों आवश्यक हैं?
प्रशासन ने पूरे इलाके को 10 सेक्टरों में बांटकर निगरानी तो बढ़ा दी है, लेकिन जमीनी हकीकत निराशाजनक है। जनता का स्वास्थ्य और जीवन किसी भी राज्य की सबसे बड़ी पूंजी है, और इस पूंजी की रक्षा के लिए बुनियादी ढांचे का मजबूत होना अनिवार्य है। वर्तमान में स्वास्थ्य विभाग की लाचारी इन तथ्यों से सामने आ रही है:
- एंबुलेंस सेवा ठप: सीएचसी पोटका की दोनों 108 एंबुलेंस खराब पड़ी हैं, जिससे गंभीर मरीजों को समय पर अस्पताल पहुंचाना मुश्किल हो रहा है।
- मानव बल की भारी कमी: डॉक्टरों, एएनएम (ANM) और मल्टीपर्पज वर्कर की कमी के कारण ग्रामीण स्तर पर अभियान प्रभावित हो रहा है।
कस्तूरबा आवासीय विद्यालय की सातवीं की छात्रा लक्खी सरदार, राहुल सरदार और सुबोला सरदार समेत चार बच्चों की मौत यह स्पष्ट करती है कि देरी से इलाज और संसाधनों के अभाव ने कितनी भारी कीमत वसूली है। जब तक स्वास्थ्य व्यवस्था को युद्धस्तर पर मजबूत नहीं किया जाएगा, तब तक यह संकट दूर नहीं होगा।
पोटका में ब्रेन मलेरिया से कितने लोग प्रभावित हुए हैं?
पिछले एक हफ्ते में पोटका के कंदार और हितबासा गांवों में 150 से अधिक लोग संक्रमित हुए हैं। गुरुवार को 1,233 लोगों की जांच में 64 नए मरीज मिले, जिनमें से 4 की हालत गंभीर है।
ब्रेन मलेरिया के प्रकोप से बच्चों की मौत क्यों हो रही है?
बच्चों की मौत का मुख्य कारण देरी से इलाज और स्वास्थ्य संसाधनों का अभाव है। पोटका सीएचसी की दोनों 108 एंबुलेंस खराब होने के कारण गंभीर बच्चों को समय पर बड़े अस्पताल नहीं ले जाया जा सका।