मध्यपूर्वी संकट में भारत की कूटनीतिक चुनौती और शांति की आवश्यकता
मध्यपूर्व में चल रहे ईरान-इजरायल संघर्ष ने वैश्विक राजनीति में एक नया मोड़ दिया है। यह संकट न केवल क्षेत्रीय स्थिरता को प्रभावित कर रहा है, बल्कि भारत जैसे शांतिप्रिय राष्ट्र के लिए भी कूटनीतिक चुनौती बनकर उभरा है।
युद्ध की राजनीति और वैश्विक प्रभाव
इतिहास साक्षी है कि राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए युद्ध का सहारा लिया जाता रहा है। आज का ईरान-अमेरिका-इजरायल संघर्ष भी इसी वैश्विक राजनीति का उदाहरण है। राष्ट्रपति ट्रंप और प्रधानमंत्री नेतान्याहू की नीतियों ने इस स्थिति को जन्म दिया है।
1950 में चीन द्वारा तिब्बत पर कब्जे के समान, आज भी मुक्ति के नाम पर सैन्य कार्रवाई की जा रही है। परंतु इसके पीछे वास्तविक राजनीतिक और आर्थिक हित छिपे हुए हैं।
संघर्ष की जटिलता
प्रारंभ में अमेरिका और इजरायल को लगा था कि वे ईरान को आसानी से पराजित कर देंगे। सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामेनेई की हत्या के बाद युद्ध समाप्ति की उम्मीद थी, परंतु ऐसा नहीं हुआ।
कई सैन्य अधिकारियों और नेताओं की मृत्यु के बावजूद ईरान ने जवाबी कार्रवाई जारी रखी। तेल अवीव पर मिसाइल हमले और खाड़ी देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर आक्रमण इस बात के प्रमाण हैं कि संघर्ष अपेक्षा से कहीं अधिक जटिल है।
मानवीय संकट
गाजा पट्टी में हुई हिंसा और नागरिकों की मौत मानवता के लिए बड़ा संकट है। बड़ी संख्या में बच्चों और आम नागरिकों की मृत्यु के बावजूद दुनिया के कई देश मौन धारण किए हुए हैं। यह स्थिति वैश्विक शांति और स्थिरता के लिए गंभीर चुनौती है।
भारत की कूटनीतिक भूमिका
इस संकट में भारत की कूटनीतिक उपस्थिति कमजोर नजर आई है। प्रधानमंत्री मोदी के फरवरी 2026 में इजरायल दौरे के बाद क्षेत्रीय तनाव और बढ़ गया है। एक विश्वगुरु के रूप में भारत से अपेक्षा थी कि वह शांति स्थापना में सक्रिय भूमिका निभाएगा।
भारत की प्राचीन परंपरा वसुधैव कुटुम्बकम् की है। अशोक महान के शांति और अहिंसा के सिद्धांतों को आगे बढ़ाते हुए भारत को मध्यस्थता की भूमिका निभानी चाहिए।
निष्कर्ष
वैश्विक स्तर पर शक्तिशाली देश अपने हितों के लिए युद्ध का सहारा ले रहे हैं। जिन देशों को लगा था कि वे ईरान को आसानी से पराजित कर देंगे, उन्हें उम्मीद के विपरीत कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।
इस स्थिति में भारत को अपनी सांस्कृतिक विरासत और कूटनीतिक परंपरा के अनुकूल शांति स्थापना में अग्रणी भूमिका निभानी चाहिए। केवल संयम, धैर्य और बुद्धिमत्तापूर्ण कूटनीति से ही इस संकट का समाधान संभव है।