मध्य पूर्व में शांति की संभावना: ट्रंप के संकेत से उम्मीद
विश्व इतिहास में युद्ध और शांति का चक्र निरंतर चलता रहा है। महान सम्राट अशोक के कलिंग युद्ध के बाद अहिंसा के मार्ग पर चलने की भांति, आज भी मानवता युद्ध की विभीषिका से शांति के पथ की तलाश में है। मध्य पूर्व में चल रहे संघर्ष के संदर्भ में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयानों से एक नई उम्मीद की किरण दिखाई दे रही है।
इतिहास की पुनरावृत्ति की संभावना
ट्रंप ने शुक्रवार को अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ईरान से 'बिना शर्त आत्मसमर्पण' की मांग की है। यह वही शब्दावली है जिसका प्रयोग उन्होंने जून 2025 में किया था, जिसके मात्र छह दिन बाद युद्धविराम की घोषणा हुई थी। यदि इतिहास अपनी पुनरावृत्ति करता है, तो 12 मार्च तक इस संघर्ष का अंत हो सकता है।
2025 के संघर्ष में 13 जून को इजरायल के हमले के बाद 17 जून को ट्रंप का 'बिना शर्त सरेंडर' का संदेश आया था। 22 जून को अमेरिकी बी-2 बॉम्बर्स ने ईरान के परमाणु ठिकानों पर बमबारी की, और 23 जून को युद्धविराम हो गया। कुल मिलाकर यह संघर्ष 12 दिनों तक चला था।
वर्तमान संकट की गंभीरता
हालांकि, वर्तमान स्थिति 2025 के संघर्ष से कहीं अधिक जटिल है। 28 फरवरी को शुरू हुए इस युद्ध में ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की मृत्यु हो गई है, जिससे देश में नेतृत्व का गहरा संकट पैदा हो गया है। पिछली बार अयातोल्लाह की उपस्थिति में शांति वार्ता संभव हुई थी, किंतु अब यह चुनौती और भी कठिन हो गई है।
इस संघर्ष का प्रभाव एक दर्जन से अधिक देशों तक फैल चुका है। ईरान ने मध्य पूर्व में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है, जिसमें कुवैत, यूएई, सऊदी अरब, जॉर्डन और कतर शामिल हैं। खाड़ी क्षेत्र के ऊर्जा निर्यात पर भी गंभीर प्रभाव पड़ा है।
मानवीय त्रासदी और शांति की आवश्यकता
युद्ध की सबसे दुखद कहानी मानवीय हानि में छुपी है। ईरान में अब तक 1200 से अधिक लोगों की जान गई है। एक स्कूल में 160 बच्चियों की मृत्यु और श्रीलंका के पास एक निहत्थे जहाज पर हुए हमले में 84 लोगों की मौत जैसी घटनाएं मानवता के लिए शर्मनाक हैं।
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान का कहना है कि मध्यस्थ देशों को उन पर दबाव डालना चाहिए जिन्होंने इस आग को भड़काया है। यह बात उस प्राचीन भारतीय परंपरा की याद दिलाती है जहां सर्वे भवन्तु सुखिनः का सिद्धांत सभी के कल्याण की बात करता है।
कूटनीति की भूमिका
2025 में अमेरिका और कतर ने मिलकर सफल मध्यस्थता की थी। किंतु इस बार कतर स्वयं संकट में है, क्योंकि ईरानी ड्रोन हमलों में उसके रास लफान गैस संयंत्र को नुकसान पहुंचा है। ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि क्या कतर इस बार भी प्रभावी मध्यस्थ की भूमिका निभा पाएगा।
भारतीय दर्शन में युद्ध को अंतिम विकल्प माना गया है। अहिंसा परमो धर्मः के सिद्धांत के अनुसार, शांति और संवाद ही सभी समस्याओं का स्थायी समाधान है। मध्य पूर्व के वर्तमान संकट में भी यही मार्ग अपनाना आवश्यक है।
आशा की किरण
ट्रंप के नवीनतम बयान में एक सकारात्मक संदेश भी छुपा है। उन्होंने कहा है कि 'ईरान का भविष्य शानदार होगा' और 'मेक ईरान ग्रेट अगेन' का नारा दिया है। यह दर्शाता है कि युद्ध के बाद पुनर्निर्माण और सहयोग की योजना भी है।
12 मार्च की तारीख अब दूर नहीं है। क्या इतिहास अपनी पुनरावृत्ति करेगा और शांति का मार्ग प्रशस्त होगा? मानवता की भलाई के लिए यही कामना करनी चाहिए कि युद्ध की आग शीघ्र बुझे और शांति का सूर्योदय हो। जैसा कि महान अशोक ने कहा था, धम्म की विजय ही सच्ची विजय है, न कि तलवार की।