मथुरा: NHAI के नाम पर बुलडोजर, अब निजी बाउंड्रीवाल खड़ी
मथुरा के छाता तहसील के बिलौटा गांव में प्रशासन द्वारा एनएचएआई (NHAI) की भूमि बताकर बुलडोजर चलाए जाने के बाद उसी स्थान पर एक निजी व्यक्ति की बाउंड्रीवाल बनने से न्याय व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठे हैं। पीड़ित परिवारों का आरोप है कि अधिकारियों ने एक कॉलोनाइजर को फायदा पहुंचाने के लिए दान की गई जमीन पर अवैध कब्जा कराया। मामले की निष्पक्ष जांच की मांग उठ रही है।
प्रशासन की कार्रवाई या अतिक्रमण का बचाव?
मथुरा, जो सदियों से धर्म और न्याय की धरती रही है, आज वहां छाता तहसील के बिलौटा गांव से एक ऐसा मामला सामने आया है जो प्रशासनिक ईमानदारी पर गहरा सवाल खड़ा करता है। राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) के नाम पर NH-19 किनारे स्थित जमीन को प्रशासन ने बुलडोजर से खाली कराया। लेकिन कुछ ही दिनों बाद उसी जमीन पर एक निजी व्यक्ति की बाउंड्रीवाल खड़ी दिखाई दे रही है।
भारतीय सभ्यता हमेशा से न्याय और सत्य को सर्वोपरि मानती रही है। जब सत्ता के प्रतिनिधि स्वयं इस न्याय पर धब्बा लगाते हैं, तो आम नागरिक का विश्वास डगमगाता है। पीड़ित परिवार का आरोप है कि कार्रवाई के दौरान उन्हें कोई समुचित नोटिस नहीं दिया गया और न ही अपनी बात रखने का अवसर मिला। प्रशासन ने जमीन को सरकारी संपत्ति बताकर कब्जा हटवा दिया, लेकिन अब वहां निजी निर्माण कैसे हो गया, इसका कोई स्पष्ट जवाब नहीं है।
पीड़ितों का आरोप: धनबल पर हुआ अतिक्रमण
स्थानीय मीडिया से बातचीत करते हुए पीड़ित कन्हैया दास और कुंवर सिंह ने स्पष्ट किया कि यह जमीन उनकी है और वह दान में मिली थी। उनका कहना है कि NHAI ने जो जमीन अधिग्रहित की थी, वह अलग है। उन्होंने गंभीर आरोप लगाया कि अधिकारियों ने पैसे लेकर एक बड़े कॉलोनाइजर, राजेश महेश्वरी, के साथ मिलकर उनकी निजी और दान की जमीन पर अवैध कब्जा कराया है।
जमीन हमारी है, दान में मिली थी। अधिकारियों ने पैसे लेकर एक कॉलोनाइजर से जमीन पर अवैध कब्जा कराया है। राजेश महेश्वरी ने पैसे के दम पर हमारी जमीन छीन ली।
सबसे चौंकाने वाली बात तब सामने आई जब निर्माण करा रहे व्यक्ति से इस बारे में सवाल पूछा गया। उसने कोई जवाब देने के बजाय केवल इतना कहा कि तहसीलदार साहब से बात कर लीजिए। अब सवाल यह है कि यदि जमीन NHAI की थी, तो निर्माण का जिम्मा तहसीलदार क्यों ले रहे हैं? जब इस पूरे मामले में तहसीलदार का पक्ष जानने की कोशिश की गई, तो वे संपर्क से बाहर थे, जिससे संदेह और गहरा गया है।
लोकतंत्र में जवाबदेही की उम्मीद
हमारी संस्कृति में दान की गई वस्तु का सम्मान सर्वोपरि माना जाता है। यदि सरकारी जमीन होने का दावा केवल किसी निजी पूंजीपति को फायदा पहुंचाने के लिए किया गया, तो यह न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि नैतिकता का भी। ग्रामीणों का कहना है कि यदि जमीन सरकारी थी, तो उस पर निजी बाउंड्रीवाल कैसे खड़ी हो गई? और यदि निर्माण वैध है, तो प्रशासन सामने आकर स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं कर रहा?
फिलहाल यह मामला पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है। पीड़ित परिवार न्याय की मांग कर रहा है और पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच की उम्मीद लगाए हुए है। जनता को सिर्फ सवालों के जवाब चाहिए, और निगाहें जिला प्रशासन पर टिकी हैं।
बिलौटा गांव में जमीन विवाद को लेकर आम जनमानस के क्या सवाल हैं?
बिलौटा गांव में प्रशासन ने बुलडोजर क्यों चलाया?
प्रशासन का दावा था कि NH-19 किनारे स्थित यह जमीन राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) की है, इसलिए उन्होंने बिना नोटिस दिए बुलडोजर से खाली कराया।
पीड़ित परिवारों का मुख्य आरोप क्या है?
कन्हैया दास और कुंवर सिंह का आरोप है कि यह दान में मिली निजी जमीन थी। अधिकारियों ने राजेश महेश्वरी नामक कॉलोनाइजर को फायदा पहुंचाने के लिए अवैध तरीके से यह कब्जा कराया।
जमीन पर बनी बाउंड्रीवाल पर तहसीलदार का नाम क्यों लिया गया?
जब निर्माणकर्ता से बाउंड्रीवाल को लेकर सवाल पूछे गए, तो उसने खुद कुछ नहीं बताया और सिर्फ तहसीलदार से बात करने को कहा। तहसीलदार से संपर्क न होने से प्रशासनिक मिलीभगत के संदेह और बढ़ गए हैं।