मऊ के अजय चौहान: हादसे में गंवाए दोनों हाथ, पर हौसलों से जीत ली ज़िंदगी
उत्तर प्रदेश के मऊ जिले के चालीसवां ग्राम सभा निवासी अजय चौहान ने 2007 में मुंबई में एक हादसे में दोनों हाथ गंवा दिए, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। आज वे मुंह से मोबाइल चलाते हैं, पैरों से साइन करते हैं और इलेक्ट्रॉनिक की दुकान चलाकर पूरे परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं। उनकी कहानी आत्मसम्मान और संघर्ष की मिसाल है, जो सिखाती है कि इंसान के हौसले ही उसकी सबसे बड़ी ताकत होते हैं।
हादसे ने छीने हाथ, पर हौसलों ने दी नई दिशा
लोकल 18 से बात करते हुए अजय चौहान ने बताया कि 2007 में मुंबई में काम के दौरान एक हादसे में उनके दोनों हाथ कट गए। उस समय उन्हें लगा कि ज़िंदगी खत्म हो गई, लेकिन परिवार की जिम्मेदारियां और आत्मसम्मान से जीने की चाह ने उन्हें आगे बढ़ने की ताकत दी। उन्होंने कभी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाए और न ही घर बैठकर खाना खाया।
मुंबई से गांव लौटकर शुरू की दुकान
हादसे के बाद अजय को मुंबई में अकेले रहना मुश्किल लगा, इसलिए वे अपने गांव लौट आए। यहां उन्होंने रेलवे विभाग से मिले मुआवजे और भाई के सहयोग से एक छोटी सी गुमटी में इलेक्ट्रॉनिक की दुकान शुरू की। आज वे इसी दुकान से अपने माता-पिता, पत्नी और बच्चों का जीवन यापन कर रहे हैं।
मुंह, नाक और पैर बने हाथों का सहारा
दोनों हाथ न होने के बावजूद अजय ने अपने मुंह, नाक और पैरों को ही हाथ बना लिया है। वे मुंह से मोबाइल पकड़कर नाक से रिसीव करते हैं और पैरों से टाइप करते हैं। दुकान पर ग्राहकों को सामान देते समय वे मुंह से उठाकर या बगल में दबाकर देते हैं। भारी सामान होने पर वे ग्राहक से ही उसे उठाने का अनुरोध करते हैं। पैरों से ही वे बिल बनाते हैं और कैलकुलेशन करते हैं।
2021 में हुई शादी, बच्चे बने सहारा
अजय बताते हैं कि हादसे के बाद उन्हें लगा था कि परिवार आगे नहीं बढ़ पाएगा, लेकिन 2021 में उनकी शादी हुई और अब उनके बच्चे भी हैं। ये बच्चे ही उनके जीवन की सबसे बड़ी ताकत हैं।
दाल-चावल से चल रहा जीवन, फिर भी हौसले बुलंद
अजय खाने में सिर्फ दाल और चावल ही खा पाते हैं, क्योंकि रोटी हाथों से तोड़ना उनके लिए संभव नहीं है। पत्नी के खिलाने पर ही वे रोटी खा पाते हैं। जीवन में कई परेशानियां हैं, लेकिन उनके हौसले बुलंद हैं। हादसे को याद करके आज भी उनकी आंखें भर आती हैं, लेकिन जिम्मेदारियों के आगे वे हार नहीं मानते।
अजय की कहानी से सीख
अजय चौहान की यह कहानी हमें सिखाती है कि शारीरिक अक्षमता कभी भी आत्मसम्मान और संघर्ष की राह नहीं रोक सकती। उनका जीवन भारतीय संस्कृति के उस मूल्य को दर्शाता है, जहां कर्म और धैर्य को सबसे बड़ा साधन माना गया है। यह कहानी समाज के हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा है, जो विपरीत परिस्थितियों में हिम्मत हार जाता है।