नेहरू से मोदी तक: भारत की अर्थव्यवस्था का ऐतिहासिक सफर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में लगातार 4399 दिनों तक प्रधानमंत्री पद पर रहकर एक नया रिकॉर्ड बनाया है। इस उपलब्धि के साथ वे देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ते हुए भारत के सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले निर्वाचित प्रधानमंत्री बन गए हैं। यह तथ्य हमें भारत की आर्थिक यात्रा पर एक गहरी नजर डालने का मौका देता है। जून 2026 के आंकड़े देश की जीडीपी और विकास दर के आंकड़े देखते ही स्पष्ट हो जाते हैं कि गत दशकों में भारत ने एक बड़ा ऐतिहासिक परिवर्तन देखा है।
हमारी सभ्यता हमें सिखाती है कि राज्य का सबसे बड़ा धर्म जनकल्याण है। इसी धर्म की प्रेरणा से भारत की आर्थिक विकास यात्रा में देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कार्यकाल दो अलग मील के पत्थर माने जाते हैं। आंकड़ों के विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि देश ने बुनियादी ढांचे से लेकर डिजिटल और औद्योगिक मोर्चे पर किस तरह एक लंबी छलांग लगाई है।
2.7 लाख करोड़ से 357 लाख करोड़ तक जीडीपी का सफर
आजादी के समय यानी साल 1947 में भारत की जीडीपी महज 2.7 लाख करोड़ रुपये अनुमानित थी। पंडित नेहरू के दौर में देश अत्यधिक सीमित संसाधनों और गरीबी से जूझ रहा था। उनके कार्यकाल के दौरान भारत की औसत जीडीपी ग्रोथ रेट करीब 3.5 प्रतिशत से 4 प्रतिशत के आसपास बनी रही। उस दौर में एक नए राष्ट्र के बुनियादी ढांचे को खड़ा करने के लिहाज से इसे महत्वपूर्ण माना गया।
इसके विपरीत, जून 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार भारत की जीडीपी आज बढ़कर करीब 357.14 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच चुकी है। इसने भारत को दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की कतार में ला खड़ा किया है। वर्तमान नेतृत्व में भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार न केवल बढ़ा है, बल्कि साल 2014-15 में जो नॉमिनल जीडीपी 106.57 लाख करोड़ रुपये थी, वह साल 2024-25 तक तीन गुना बढ़कर 331.03 लाख करोड़ रुपये के स्तर पर पहुंच गई है।
वैश्विक संकटों के बीच अडिग विकास दर
पंडित नेहरू के समय में वैश्विक स्तर पर शीत युद्ध का दौर था और देश आंतरिक मोर्चों पर अपनी अर्थव्यवस्था को संभाल रहा था। वहीं पिछले एक दशक में भारत ने कोविड-19 महामारी, वैश्विक मुद्रास्फीति, भू-राजनीतिक संघर्षों और सप्लाई-चेन में आई बड़ी रुकावटों के बावजूद दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था का दर्जा बनाए रखा है। यह भारत की अदम्य आंतरिक शक्ति और संकटमोचन की क्षमता का प्रमाण है।
निर्यात और विदेशी निवेश में अभूतपूर्व उछाल
आजादी के शुरुआती दशकों में भारत काफी हद तक आयात पर निर्भर था और विदेशी मुद्रा का संकट एक बड़ी चुनौती थी। लेकिन पिछले एक दशक में भारत की वैश्विक व्यापारिक हिस्सेदारी बहुत मजबूत हुई है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक साल 2013-14 में देश का कुल निर्यात जो 468 बिलियन अमेरिकी डॉलर था, वह साल 2024-25 में करीब 76 प्रतिशत बढ़कर 825 बिलियन अमेरिकी डॉलर के ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गया। इसमें सबसे बड़ी हिस्सेदारी सर्विसेज एक्सपोर्ट की रही, जो 158 बिलियन अमेरिकी डॉलर से दोगुने से भी ज्यादा बढ़कर 387 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गई।
विदेशी निवेश के मोर्चे पर भी भारत आज दुनिया के सबसे पसंदीदा देशों में शामिल है। दिसंबर 2024 तक संचयी एफडीआई प्रवाह करीब 89.85 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है, जिसमें से लगभग 67 प्रतिशत हिस्सा (667.74 बिलियन अमेरिकी डॉलर) केवल पिछले 10 वर्षों (2014-24) में प्राप्त हुआ है।
महंगाई पर लगाम और सरकारी उद्यमों का कायाकल्प
शासन का एक महत्वपूर्ण धर्म जनता को महंगाई के अत्याचार से बचाना है। साल 2004 से 2014 के बीच देश में औसत खुदरा महंगाई दर 8.2 प्रतिशत के उच्च स्तर पर थी। वहीं पिछले एक दशक (2015-25) में इसे नियंत्रित कर औसतन 5 प्रतिशत के दायरे में लाया गया है। साल 2024-25 में खुदरा महंगाई दर गिरकर 4.6 प्रतिशत पर आ गई है, जो 2018-19 के बाद का सबसे निचला स्तर है।
इसके अलावा सरकारी कंपनियों (CPSEs) की सेहत में भी बड़ा सुधार देखा गया है। साल 2014 में देश में महारत्न कंपनियों की संख्या केवल 7 थी, जो साल 2025 तक दोगुनी होकर 14 हो चुकी है। इस दौरान ऑपरेटिंग सरकारी कंपनियों का नेट प्रॉफिट 1.3 लाख करोड़ रुपये (वित्तीय वर्ष 14) से 149 प्रतिशत बढ़कर 3.2 लाख करोड़ रुपये (वित्तीय वर्ष 24) पर पहुंच गया।
शासन और संचार का माहौल: तब और अब
आर्थिक मोर्चे के अलावा दोनों नेताओं के कार्यकाल में शासन और संचार के माहौल में भी एक बड़ा अंतर रहा है। पंडित नेहरू ने एक ऐसे दौर में शासन किया जब देश में निजी समाचार चैनल, सोशल मीडिया या डिजिटल संचार जैसी चीजें मौजूद नहीं थीं। इससे नीतियों पर जनता की प्रतिक्रिया आने में लंबा समय लगता था।
इसके ठीक उलट आज का दौर डिजिटल युग है, जहां 24x7 मीडिया माहौल, सोशल मीडिया की सक्रियता और हर नीति की रीयल-टाइम डिजिटल समीक्षा होती है। इस पारदर्शी और त्वरित प्रतिक्रिया वाले माहौल में सरकार ने यूपीआई और जनधन जैसे डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के जरिए देश के कोने-कोने तक वित्तीय समावेशन को पहुंचाया है। अप्रैल 2025 तक जनधन खातों की संख्या 55.17 करोड़ को पार कर गई है। यह विकास का वह मॉडल है जो समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने के आदर्श को साकार करता है।