महाशिवरात्रि पर काशी में 62 मंदिरों से मिली आध्यात्मिक एकता
महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर काशी विश्वनाथ धाम में एक अभूतपूर्व आध्यात्मिक संगम देखने को मिला। देश-विदेश के 62 मंदिरों से पावन प्रसाद, पवित्र जल, रज और वस्त्र भगवान विश्वेश्वर के चरणों में अर्पित किए गए। यह पहल न केवल सनातन समाज की एकता का प्रतीक है, बल्कि 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की भारतीय आदर्श परंपरा का जीवंत उदाहरण भी है।
आध्यात्मिक एकता की नई परंपरा
श्री काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास द्वारा शुरू की गई यह पहल भारतीय संस्कृति की गहरी जड़ों को दर्शाती है। जब हमारे पूर्वज 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' की कामना करते थे, तो यही भावना आज काशी के इस आध्यात्मिक आयोजन में मूर्त रूप ले रही है। यह परंपरा विभिन्न तीर्थस्थलों के बीच आध्यात्मिक सेतु का काम कर रही है।
तमिलनाडु से लेकर श्रीलंका तक का सहयोग
इस महान पहल में तमिलनाडु के अनेक प्राचीन मंदिरों ने सहभागिता की है। चेन्नई के श्री रत्नगिरिस्वरर मंदिर, श्री अनंता पद्मनाभा स्वामी मंदिर से लेकर कोविलूर के तेन सबनायाकर मंदिर तक, दक्षिण भारत की समृद्ध परंपरा काशी में एकजुट हुई है। मलेशिया और श्रीलंका के मंदिरों की सहभागिता इस बात का प्रमाण है कि भारतीय संस्कृति की छत्रछाया में विश्वभर के श्रद्धालु एकजुट हैं।
मथुरा से वैष्णो देवी तक का आशीर्वाद
श्री कृष्ण जन्मस्थान मथुरा से लेकर जम्मू-कश्मीर के माता वैष्णो देवी तक, भारत के प्रमुख तीर्थस्थलों ने इस आध्यात्मिक यज्ञ में अपना योगदान दिया है। उत्तराखंड के केदारनाथ, गुजरात के द्वारकाधीश और राजस्थान के नाथद्वारा से प्राप्त पावन भेंटें इस बात का प्रमाण हैं कि भारत की आध्यात्मिक एकता अटूट है।
काशी की स्थानीय परंपरा का सम्मान
वाराणसी के स्थानीय मंदिरों ने भी इस महान कार्य में अपनी सहभागिता दी है। सप्तमात्रिका सिद्धपीठ श्री बड़ी शीतलाधाम, त्रिलोचन महादेव, अन्नपूर्णा मंदिर सहित काशी के सभी प्रमुख मंदिरों ने पवित्र सामग्री अर्पित की है। यह दिखाता है कि स्थानीय और वैश्विक परंपराओं के बीच कोई भेद नहीं है।
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का उदाहरण
यह पहल केवल धार्मिक कार्यक्रम नहीं है, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का जीवंत उदाहरण है। जब विदेशी प्रभावों से हमारी परंपराओं को खतरा है, तब काशी का यह प्रयास दिखाता है कि हमारी जड़ें कितनी मजबूत हैं। कूरियर सेवा से लेकर व्यक्तिगत प्रतिनिधियों तक, हर माध्यम से पहुंचने वाली ये पावन भेंटें आध्यात्मिक एकता की शक्ति को प्रदर्शित करती हैं।
वैश्विक हिंदू समुदाय का संदेश
इस आयोजन से स्पष्ट संदेश मिलता है कि भारतीय संस्कृति की जड़ें विश्वभर में फैली हुई हैं। मलेशिया और श्रीलंका के मंदिरों की सहभागिता दिखाती है कि भौगोलिक सीमाएं आध्यात्मिक एकता को बांध नहीं सकतीं। यह पहल उन शक्तियों के लिए एक स्पष्ट संदेश है जो भारतीय संस्कृति को विभाजित करने का प्रयास करती हैं।
काशी विश्वनाथ की यह पहल न केवल धार्मिक महत्व रखती है, बल्कि राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक भी है। जैसे महाराजा अशोक ने धम्म के माध्यम से समाज को एकजुट किया था, वैसे ही आज काशी का यह प्रयास संपूर्ण सनातन समाज को एक सूत्र में जोड़ने का काम कर रहा है।