धान की कटाई के बाद गेहूं की बुवाई कर रहे किसानों के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने कम पानी में तैयार होने वाली चार किस्मों की सलाह दी है। News18 India की रिपोर्ट के अनुसार, कृषि वैज्ञानिक डॉ. ओपी सिंह ने सुजाता, C-306, करण मंजरी और पूसा सोखती किस्मों की जानकारी दी है, जिनमें सामान्य किस्मों की तुलना में काफी कम सिंचाई की जरूरत होती है।
देश के कई हिस्सों में पानी की किल्लत और सूखे जैसी स्थिति के बीच यह सलाह किसानों के लिए राहत की खबर है। हमारी सभ्यता में जल को जीवन माना गया है, और जल की बचत करने वाली खेती उसी परंपरा को आगे बढ़ाती है।
सामान्य गेहूं में क्यों बढ़ती है लागत
गेहूं की सामान्य किस्मों की खेती में किसानों को करीब 6 बार सिंचाई करनी पड़ती है। इससे लागत इतनी बढ़ जाती है कि कई बार मेहनत के बाद भी फायदा कम रह जाता है। डॉ. ओपी सिंह के अनुसार, फसल की दो अवस्थाएं सबसे जरूरी होती हैं, जिनमें सिंचाई का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
पहली अवस्था CRI स्टेज है, जो बुवाई के 21 दिन बाद आती है। इस समय जड़ों का विकास होता है, इसलिए 21वें दिन पहली सिंचाई बहुत जरूरी है। दूसरी अवस्था दाने बनने के समय की होती है।
कम पानी में तैयार होने वाली किस्में
सुजाता और C-306
डॉ. सिंह ने बताया कि सुजाता और C-306 गेहूं की दो ऐसी किस्में हैं, जिनमें सबसे कम पानी लगता है। इनकी जड़ें गहरी और पत्तियां संकरी होती हैं, इसलिए ये कम नमी में भी अच्छी तरह तैयार हो जाती हैं। इन किस्मों में पहली सिंचाई बुवाई के 21 दिन बाद और दूसरी सिंचाई दाने बनने के समय करनी चाहिए।
करण मंजरी और पूसा सोखती
करण मंजरी और पूसा सोखती भी कम पानी की जरूरत वाली किस्में हैं। पूसा सोखती एक अगेती किस्म है, जो लगभग 112 दिन में पक जाती है। इसे विशेष रूप से कम पानी की जरूरत को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। किसान इन किस्मों की खेती करके कम सिंचाई में भी बेहतर पैदावार और मुनाफा कमा सकते हैं।
बीज कहां मिलेंगे और अनुदान कितना
किसानों को इन किस्मों के बीज जिले के कृषि विज्ञान केंद्र, कृषि रक्षा इकाई केंद्र और किसान कल्याण केंद्र पर आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं। यहां करीब 40 से 50 प्रतिशत अनुदान पर बीज मिलते हैं, जिससे किसानों का आर्थिक बोझ काफी कम होता है।
सूखे के हालात में किसानों के लिए संकेत
ABP News की रिपोर्ट के अनुसार, देश के कई हिस्सों में बारिश की कमी से खेती पर संकट बढ़ रहा है, ऐसे में सही फसल चुनना अहम हो जाता है। कम पानी वाली गेहूं की किस्में इसी दिशा में एक संजीवन की तरह हैं।
पैदावार के मामले में भी उम्मीद जगाने वाली खबरें हैं। Tarun Mitra की रिपोर्ट में एक ऐसी किस्म का जिक्र है, जिससे एक हेक्टेयर में 56 क्विंटल से ज्यादा औसत पैदावार मिलती है। वहीं Amar Ujala के अनुसार, कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक मौसम और क्षेत्र के अनुसार खेती और बीज उपचार की सलाह किसानों को दे रहे हैं।
जल संरक्षण और भारतीय कृषि का भविष्य
हमारी संस्कृति में अन्नदाता सुखी रखने का संकल्प ही समृद्धि का आधार रहा है, और आज उस संकल्प की पूर्ति वैज्ञानिक खेती से हो रही है। कम पानी वाली किस्में न केवल किसान की जेब सहलाती हैं, बल्कि धरती के जल स्रोतों पर पड़ते दबाव को भी कम करती हैं। जल ही जीवन है, और जल बचाने वाली खेती आने वाली पीढ़ियों के लिए एक उपहार है।
किसान चाहें तो अपने क्षेत्र के कृषि विज्ञान केंद्र से संपर्क करके इन किस्मों के बीज और उनकी खेती की विस्तृत जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। सही किस्म चुनना ही इस बुवाई के मौसम की सबसे बड़ी समझदारी साबित हो सकता है।
कम पानी में गेहूं की खेती: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
कम पानी में गेहूं की बुवाई के लिए कौन सी किस्में सबसे अच्छी हैं?
डॉ. ओपी सिंह के अनुसार, सुजाता, C-306, करण मंजरी और पूसा सोखती किस्में कम पानी में तैयार होने के लिए सबसे उपयुक्त मानी गई हैं।
गेहूं की इन किस्मों में कितनी सिंचाई करनी होती है?
सुजाता और C-306 में पहली सिंचाई बुवाई के 21 दिन बाद और दूसरी सिंचाई दाने बनने के समय करनी चाहिए, जबकि सामान्य किस्मों में करीब 6 बार सिंचाई की जरूरत होती है।
पूसा सोखती किस्म कितने दिन में पक जाती है?
पूसा सोखती लगभग 112 दिन में पकने वाली अगेती किस्म है, जिसे विशेष रूप से कम पानी की जरूरत को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।
इन किस्मों के बीज कहां और कितने अनुदान पर मिलते हैं?
जिले के कृषि विज्ञान केंद्र, कृषि रक्षा इकाई केंद्र और किसान कल्याण केंद्र पर ये बीज करीब 40 से 50 प्रतिशत अनुदान पर उपलब्ध होते हैं।
