ईरान की संसद ने 18 अक्टूबर 2026 को मिसाइल विशेषज्ञ मेहरदाद अखलाखी केताबची को नया रक्षा मंत्री के पद की मंजूरी दे दी। पद संभालते ही उन्होंने अमेरिका को कड़ी चेतावनी देते हुए दावा किया कि 12-दिन के युद्ध के बाद ईरान की रक्षा क्षमताएं पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो चुकी हैं। इसी बीच स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और आसपास के समुद्री इलाकों में एक सप्ताह में करीब 14 जहाजों पर हमले दर्ज हुए हैं।
News18 India की रिपोर्ट के मुताबिक, संसद में कुल 277 वोट पड़े, जिनमें 237 केताबची के समर्थन में रहे और सिर्फ 15 विरोध में। किसी सांसद ने मतदान से दूरी नहीं बनाई। यह निर्णय ऐसे समय आया है जब ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच सैन्य तनाव लगातार बढ़ रहा है।
आठ महीने बाद भरा गया रिक्त पद
केताबची ने ब्रिगेडियर जनरल अजीज नासिरजादेह की जगह ली है। नासिरजादेह की फरवरी में युद्ध की शुरुआत के दौरान अमेरिका और इजरायल के हवाई हमले में मौत हो गई थी। उसके बाद राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने ब्रिगेडियर जनरल माजिद इब्न अल रेजा को कार्यवाहक रक्षा मंत्री बनाया था। यानी ईरान को अपना स्थायी रक्षा मंत्री लगभग आठ महीने बाद मिला है, जैसा कि Mediasaheb ने अपनी रिपोर्ट में नोट किया है।
ईरान के सरकारी प्रसारक प्रेस टीवी के अनुसार, केताबची रक्षा उद्योग के अनुभवी अधिकारी हैं। वे एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज ऑर्गनाइजेशन और डिफेंस इंडस्ट्रीज ऑर्गनाइजेशन दोनों के प्रमुख रह चुके हैं। इन भूमिकाओं में उन्होंने मिसाइल तकनीक और हथियार उत्पादन से जुड़े कामों की देखरेख की। The Sandesh Wahak की रिपोर्ट भी उन्हें रक्षा उत्पादन और सैन्य प्रौद्योगिकी का अनुभवी विशेषज्ञ बताती है।
उनके नाम के साथ अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध भी जुड़े हैं। संयुक्त राष्ट्र ने 2007 में शहीद बाघेरी इंडस्ट्रियल ग्रुप से उनके संबंधों के चलते उन्हें अपनी प्रतिबंध सूची में शामिल किया था। यह समूह ठोस ईंधन से चलने वाली बैलिस्टिक मिसाइलों के विकास और निर्माण से जुड़ा है। अमेरिका ने भी ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम में उनकी कथित भूमिका के कारण उन पर प्रतिबंध लगाए हैं।
अमेरिका को क्या चेतावनी दी?
पद संभालने के बाद केताबची ने साफ शब्दों में कहा कि अगर अमेरिका ने कोई और गलत कदम उठाया, तो ईरान की ओर से बड़ा और चौंकाने वाला जवाब दिया जाएगा।
उन्होंने आगे कहा कि ऐसे किसी कदम के क्षेत्रीय और वैश्विक परिणामों की जिम्मेदारी अमेरिका और उसके सहयोगियों की होगी। CNBC Awaaz की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने यह भी कहा कि अगर एक बम भी गिराया गया तो अंजाम भुगतना पड़ेगा। Live Hindustan की खबर में इस बात का जिक्र है कि उन्होंने 'मदर ऑफ ऑल बम' के इस्तेमाल की स्थिति में भी कड़ा जवाब देने की बात कही।
नए रक्षा मंत्री का यह बयान ईरान के भीतर सख्ती और आत्मनिर्भरता के संदेश के साथ आया है। उन्होंने दावा किया कि 12-दिन के युद्ध के बाद ईरान ने अपनी रक्षा क्षमताओं को काफी बेहतर बनाया है।
अगले साल उड़ेगा स्वदेशी भारी लड़ाकू विमान
केताबची ने यह भी घोषणा की कि ईरान का पूरी तरह स्वदेश में निर्मित भारी लड़ाकू विमान अगले साल उड़ान भरेगा। यह दावा ऐसे समय आया है जब ईरान अपनी रक्षा तकनीक और सैन्य उत्पादन पर लगातार जोर दे रहा है।
पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के बावजूद अपनी तकनीक खुद विकसित करने का यह रास्ता उस पुरानी भारतीय सोच से मिलता-जुलता है जो आत्मनिर्भरता को सबसे बड़ी ताकत मानती है। जिस तरह भारत ने दशकों के प्रतिबंधों के बीच अपनी स्पेस और रक्षा क्षमताएं खड़ी कीं, ईरान भी वही दिशा में कदम बढ़ा रहा है, हालांकि उसका सैन्य इरादा विवादों में घिरा हुआ है।
होर्मुज में समुद्री तनाव का बढ़ता दायरा
समुद्री मोर्चे पर हालात और खराब हो रहे हैं। यूनाइटेड किंगडम मैरीटाइम ट्रेड ऑपरेशंस (UKMTO) के मुताबिक, रविवार सुबह यमन और संयुक्त अरब अमीरात के तट के पास दो जहाजों पर हमले हुए। इससे पहले शनिवार को ईरान के सुरक्षा बलों ने तीन जहाजों में आग लगने की जानकारी दी थी, जिनमें से दो जहाज होर्मुज के भीतर या आसपास समुद्री बारूदी सुरंगों की चपेट में आए थे।
आंकड़े चिंताजनक हैं। 8 से 14 अक्टूबर के बीच करीब 14 जहाजों पर हमले हुए। ईरान के खिलाफ अमेरिका-इजरायल युद्ध शुरू होने के बाद यह एक सप्ताह में दर्ज हमलों की सबसे बड़ी संख्या है। 11 अक्टूबर को अकेले कम से कम छह जहाजों को निशाना बनाया गया। 1 मार्च से अब तक समुद्री सुरक्षा से जुड़ी घटनाओं की संख्या बढ़कर 149 पहुंच गई है।
व्यापार पर इसका सीधा असर दिख रहा है। 8 से 14 अक्टूबर के बीच होर्मुज से सिर्फ 42 जहाज गुजरे, जबकि उससे पिछले सप्ताह यह संख्या 60 थी। यह जलडंड विश्व तेल आपूर्ति की मुख्य धमनी है और भारत समेत एशिया के कई देशों की ऊर्जा जरूरतें इसी रास्ते से निर्भर करती हैं। यही कारण है कि इस क्षेत्र में शांति कायम रहना भारत की अर्थव्यवस्था के लिए भी अहम है।
भारत के लिए क्या मायने रखता है यह विकास
ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ता टकराव भारत के लिए कूटनीतिक संतुलन का सवाल बन गया है। वहीं, अमेरिका की ओर से भारत को सहयोगी बताने वाले बयान भी हाल ही में सामने आए थे, जैसा कि हमने
