चंदवा के ब्रज मोहन राम को ओडिशा के राज्यपाल की संवैधानिक जिम्मेदारी मिली है। बिहार विधानसभा से अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत करने वाले और तीन बार लोकसभा के सदस्य रहे ब्रजमोहन राम की यह यात्रा मित्रों के सहयोग और सामाजिक सेवा से जुड़े लंबे सार्वजनिक जीवन का परिणाम है।
उनकी कहानी केवल एक राजनीतिक उत्थान नहीं है। यह उन साधारण साधनों, आपसी भरोसे और जन्मभूमि से अटूट रिश्ते की भी कहानी है, जो भारतीय लोकतंत्र की मूल भावना को दर्शाती है।
मित्रों के सहयोग से शुरू हुआ पहला चुनाव
ब्रज मोहन राम के पहले विधानसभा चुनाव की तस्वीर आज की चुनावी राजनीति से बिल्कुल अलग दौर की याद दिलाती है। राजेश चंद्र पाण्डेय, नरेश प्रसाद गुप्ता, नवल किशोर लाल, रामवृक्ष चौधरी, गणेश चौरसिया, स्वर्गीय सेवक मिस्त्री, स्वर्गीय रामजी राम वर्मा, चंद्रमोहन साहू और अशोक कुमार जैसे मित्रों के आग्रह पर उन्होंने चुनाव लड़ने का निर्णय लिया था।
उस दौर में साधन सीमित थे, मगर हौसला बुलंद। किसी मित्र ने भाषण लिखने की जिम्मेदारी ली, किसी ने प्रचार की जीप के लिए अपनी जेब से डीजल जुटाया। कोई गाड़ी चलाता था, तो कोई गांव-गांव में संपर्क और बूथ स्तर की रणनीति बनाता था। चुनाव एक व्यक्ति लड़ रहा था, मगर उसके पीछे मित्रों का पूरा समूह खड़ा था।
यह बात सार्वजनिक जीवन की एक सच्चाई को रेखांकित करती है कि पहला कदम उठाने का साहस अक्सर आसपास के लोगों के विश्वास से मिलता है।
चंदवा से विधानसभा और तीन लोकसभाओं तक का सफर
ब्रज मोहन राम का जन्म एक जनवरी 1958 को तत्कालीन बिहार के पलामू जिले के चंदवा में हुआ था। उनके पिता अर्जुन राम बैठा और माता चैती देवी थीं। उन्होंने लोहरदगा के बीएस कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई की।
वर्ष 1991 से 1995 तक वह लातेहार विधानसभा क्षेत्र से बिहार विधानसभा के सदस्य रहे। इसके बाद वर्ष 1996 में 11वीं लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए और फिर 1998 की 12वीं तथा 1999 की 13वीं लोकसभा में भी उन्हें जनता ने संसद भेजा। अब ओडिशा के राज्यपाल के रूप में उनकी भूमिका संवैधानिक दायित्वों से जुड़ गई है।
छठ, सेवा और जन्मभूमि से आज भी जुड़ाव
राजभवन तक पहुंचने के बाद भी चंदवा से उनका रिश्ता कायम है। लगभग 55 वर्ष पूर्व छठ व्रतियों की सेवा के उद्देश्य से शुरू हुए विवेकानंद किशोर संस्थान के संस्थापक सदस्यों में वह शामिल रहे हैं। छठ घाट पर लगने वाली संघ की शाखा तक उनकी मौजूदगी रही है।
छठ महापर्व में त्याग, अनुशासन और सेवा की भावना समाहित है। जिस पर्व में समाज अपनी लोकपरंपरा से जुड़ता है, उसी पर्व की सेवा में उनकी भागीदारी उनके व्यक्तित्व का आत्मीय पक्ष सामने लाती है।
चंदवा में चल रहे शवदाह गृह निर्माण कार्य में भी वह सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। शिलान्यास से निर्माण तक उनका योगदान जारी है। दुख की घड़ी में सम्मानजनक अंतिम विदाई की व्यवस्था जैसी सार्वजनिक सुविधा समाज के लिए बड़ी राहत बनती है।
क्या इस सफर से मिलता है संदेश?
ब्रज मोहन राम की यात्रा बताती है कि भारतीय लोकतंत्र में सेवा, धैर्य और अपनी जड़ों से जुड़े रहने से बड़ी जिम्मेदारियों तक का मार्ग खुल सकता है। जिनके लिए कभी जीप का डीजल जुटाना पड़ा, आज वही राज्य के संवैधानिक पद पर आसीन हैं। यह सफर युवाओं के लिए एक ऐतिहासिक शिक्षा है कि राजनीति में आस्था और अखंडता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितनी साधन।
Photo: दैनिक जागरण (Dainik Jagran)
