झारखंड में आदिवासी समुदाय का न्याय की मांग: सोमा मुंडा हत्याकांड के विरोध में राज्यव्यापी बंद
झारखंड की धरती पर एक बार फिर न्याय की आवाज गूंजी है। खूंटी जिले के पड़हा राजा सोमा मुंडा की हत्या के मुख्य आरोपियों की गिरफ्तारी न होने के विरोध में आदिवासी समुदाय ने शनिवार को राज्यव्यापी बंद का आयोजन किया। यह संघर्ष केवल एक व्यक्ति की हत्या का मामला नहीं, बल्कि जल, जंगल और जमीन के अधिकारों की रक्षा करने वाले समाजिक नेताओं पर हो रहे लगातार हमलों के विरुद्ध एक सामूहिक प्रतिरोध है।
गुमला में दिखा एकजुटता का प्रभाव
गुमला टावर चौक पर आदिवासी समुदाय के लोगों ने अपना विरोध व्यक्त करते हुए टायर जलाए और लगभग एक घंटे तक मुख्य मार्ग को बंद रखा। इस दौरान आवागमन पूरी तरह ठप रहा। झारखंड की पूर्व मंत्री गीताश्री उरांव ने भी इस बंद का समर्थन किया और रांची से गुमला पहुंचकर आंदोलनकारियों का हौसला बढ़ाया।
उन्होंने कहा, "जमीन लूट के कारण लगातार सामाजिक अगुवाओं की हत्या हो रही है। खूंटी में सोमा मुंडा की हत्या और पुलिस द्वारा सही साजिशकर्ताओं को नहीं पकड़ना दुर्भाग्य की बात है।"
जमीन और न्याय का संघर्ष
मूली पड़हा के कोटवार देवेंद्र लाल उरांव ने इस समस्या की जड़ को स्पष्ट करते हुए कहा कि सामाजिक और ग्रामसभा की जमीनों को सरकारी तंत्र का सहारा लेकर दलालों और बिचौलियों द्वारा लूटा जा रहा है। जमीन बचाने के लिए आगे आने वाले नेताओं की लगातार हत्या हो रही है, जो झारखंड के लिए लज्जा का विषय है।
उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा, "आज जल, जंगल और जमीन के लिए लड़ने वाले मारे जा रहे हैं। यदि सरकार ऐसे हत्यारों पर लगाम नहीं लगाती है, तो आगे के आंदोलन को सरकार संभाल नहीं पाएगी।"
राज्यभर में दिखा एकजुटता का संदेश
सिसई प्रखंड में केंद्रीय सरना समिति के अध्यक्ष जलेश्वर उरांव की अध्यक्षता में आयोजित बैठक में बंद को सफल बताया गया। कामडारा प्रखंड में मिशन चौक पर वाहनों को रोका गया और रांची-ओडिशा मुख्य पथ पर आवागमन पूरी तरह बाधित रहा।
भरनो में आदिवासी संगठनों के लोगों ने अस्पताल चौक के पास गुमला-रांची मुख्य सड़क को जाम कर दिया और पड़हा राजा सोमा मुंडा के असली गुनहगार की गिरफ्तारी की मांग की। थानेदार कंचन प्रजापति की मध्यस्थता से जाम खुलवाया गया, जिसके बाद प्रदर्शनकारियों ने ब्लॉक अधिकारी को ज्ञापन सौंपा।
न्याय और एकता का संदेश
यह आंदोलन झारखंड की उस महान परंपरा को दर्शाता है जहां समुदाय अपने अधिकारों की रक्षा के लिए एकजुट होकर खड़ा होता है। यह संघर्ष न केवल न्याय की मांग है, बल्कि भारतीय सभ्यता के उन मूल्यों का प्रतिनिधित्व करता है जो शांति, एकता और न्याय पर आधारित हैं।
आदिवासी समुदाय का यह शांतिपूर्ण प्रतिरोध दिखाता है कि न्याय की लड़ाई में एकजुटता की शक्ति कितनी महत्वपूर्ण है। यह उम्मीद की जाती है कि सरकार इस न्यायसंगत मांग पर तत्काल ध्यान देगी और दोषियों को कानून के कटघरे में लाने के लिए उचित कार्रवाई करेगी।