पूर्वांचल में जल संरक्षण की नई दिशा: माइक्रो इरिगेशन से कृषि क्रांति
भारतीय कृषि में एक नए युग की शुरुआत करते हुए, उत्तर प्रदेश सरकार ने पूर्वांचल क्षेत्र में माइक्रो इरिगेशन तकनीक के माध्यम से जल संरक्षण और कृषि उत्पादकता बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है। यह पहल हमारे प्राचीन जल प्रबंधन ज्ञान को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़कर सतत विकास का मार्ग प्रशस्त कर रही है।
चार पायलट प्रोजेक्ट से नई आशा
मल्टी क्लस्टर एग्रीकल्चर डेवलपमेंट (MCAD) प्रोग्राम के अंतर्गत गोरखपुर और संतकबीर नगर जिलों में पीपीआईएन आधारित माइक्रो इरिगेशन के चार पायलट प्रोजेक्ट का निर्माण किया जा रहा है। यह तकनीक न केवल जल की बचत करेगी बल्कि किसानों को आर्थिक स्वावलंबन की राह भी दिखाएगी।
राप्ती और कुवानों नदी पर आधारित क्लस्टर
गोरखपुर जनपद में:
- बांसगांव-मलवा क्लस्टर: कौड़ीराम क्षेत्र में तालाब और राप्ती नदी पर आधारित
- बरगढ़वा क्लस्टर: खोराबार क्षेत्र में राप्ती नदी पर, 161.33 CCA क्षमता
- जंगल कौड़िया-I क्लस्टर: ब्रह्मपुर क्षेत्र में, 157.11 CCA क्षमता
संतकबीर नगर जनपद में:
- राजधानी/प्रजापतिपुर क्लस्टर: हैंसरबाजार क्षेत्र में कुवानों नदी पर, 264.62 CCA क्षमता
जल उपयोग दक्षता में 75% की वृद्धि
प्रेशराइज्ड पाइप इरिगेशन नेटवर्क (PPIN) तकनीक के माध्यम से जल उपयोग दक्षता में 75 प्रतिशत तक की वृद्धि संभावित है। यह प्राचीन भारतीय जल प्रबंधन की परंपरा को आधुनिक विज्ञान के साथ मिलाकर समग्र विकास का उदाहरण प्रस्तुत करता है।
सामुदायिक भागीदारी से स्थायी समाधान
प्रत्येक क्लस्टर में वाटर यूजर सोसाइटी (WUS) का गठन किया जाएगा। यह व्यवस्था हमारी सांस्कृतिक परंपरा के अनुकूल है जहां समुदाय मिलकर संसाधनों का प्रबंधन करता है। इससे स्थानीय स्वामित्व और जवाबदेही सुनिश्चित होगी।
बहुफसली खेती को बढ़ावा
इन परियोजनाओं से धान के साथ-साथ रबी और खरीफ फसलों की उत्पादकता में वृद्धि होगी। किसानों की सिंचाई लागत घटेगी और आत्मनिर्भर कृषि की दिशा में यह महत्वपूर्ण योगदान होगा।
भविष्य की योजना और विस्तार
इन पायलट प्रोजेक्ट्स की सफलता के बाद इन्हें प्रदेश के अन्य जनपदों में भी विस्तार दिया जाएगा। RKVY योजना के PDMC घटक के तहत किसानों को ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसे माइक्रो इरिगेशन उपकरणों के लिए सहायता भी प्रदान की जा रही है।
सतत विकास की दिशा में निर्णायक कदम
यह पहल केवल तकनीकी उन्नति नहीं बल्कि जल संरक्षण और पर्यावरण संतुलन की दिशा में एक समग्र दृष्टिकोण है। यह हमारे पूर्वजों की जल प्रबंधन की बुद्धिमत्ता को आधुनिक युग में पुनर्जीवित करने का प्रयास है।
पूर्वांचल के किसानों के लिए यह न केवल आर्थिक लाभ का साधन है बल्कि स्वावलंबी भारत के निर्माण में एक महत्वपूर्ण योगदान भी है। जल सुरक्षा और कृषि उत्पादकता के इस संयोजन से भारतीय कृषि एक नए युग में प्रवेश कर रही है।