शारदीय नवरात्र 2026 में महाष्टमी का व्रत 18 अक्टूबर, रविवार को रखा जाएगा और महानवमी का व्रत 19 अक्टूबर, सोमवार को। ज्योतिर्विद दिवाकर त्रिपाठी ने हिंदुस्तान समाचार पत्र को बताया कि अष्टमी और नवमी को लेकर फैली असमंजस की स्थिति अब खत्म हो चुकी है।
इस साल तिथियों का गणित ऐसा है कि अष्टमी और नवमी दोनों 19 अक्टूबर को एक साथ नहीं मनानी चाहिए। पंचांग के अनुसार अष्टमी तिथि 18 अक्टूबर को सूर्योदय से पूर्व प्रातः 5:53 बजे आरंभ होकर 19 अक्टूबर को प्रातः 7:53 बजे तक रहेगी। इसी आधार पर महाष्टमी का व्रत, निशा पूजा और अष्टमी का कन्या पूजन 18 अक्टूबर को ही उचित माना गया है।
शारदीय नवरात्र में अष्टमी का व्रत कब रखें?
ज्योतिर्विद दिवाकर त्रिपाठी ने समझाया कि नवरात्र में रात्रि का विशेष महत्व है, जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है। नौ रातों का यह पर्व इसीलिए नवरात्र कहलाता है। काशी के पंचांगों के अनुसार अष्टमी तिथि 18 अक्टूबर को प्रातः 5:53 बजे से शुरू हो रही है।
यदि कोई 19 अक्टूबर को अष्टमी का व्रत करता है तो उस दिन अष्टमी तिथि की रात प्राप्त ही नहीं होगी। तिथि सूर्योदय से पूर्व ही आरंभ होने के कारण किसी भी स्थिति में महाष्टमी का व्रत 18 अक्टूबर, रविवार को ही किया जाएगा। इस साल अष्टमी तिथि की वृद्धि भी हो रही है, जिससे महानिशा पूजा का महत्व और बढ़ जाता है।
यह बात केवल एक ज्योतिर्विद की राय नहीं है। जागरण की रिपोर्ट में प्रयागराज के ज्योतिषियों ने भी यही स्पष्ट किया है कि अष्टमी का व्रत 18 अक्टूबर को और महानवमी 19 अक्टूबर को मनाई जाएगी।
क्यों अष्टमी और नवमी को 19 अक्टूबर पर एक साथ न करें?
ग्रहों की दृष्टि से भी यह निर्णय समर्थित है। ज्योतिर्विद त्रिपाठी ने बताया कि सप्तमी तिथि का स्वामी शनि है, अष्टमी का स्वामी राहु है और नवमी का स्वामी सूर्य है। शनि और राहु मित्र ग्रह हैं, जबकि सूर्य शत्रु ग्रह माना जाता है।
इसलिए यदि अष्टमी तिथि सप्तमी के साथ प्राप्त होती है तो वही अष्टमी ग्राह्य होगी। व्रत करने पर वह विशेष फलदायी सिद्ध होगी। इसके विपरीत, यदि अष्टमी नवमी के साथ मिलाकर मनाई जाती है तो राहु और सूर्य का योग बनता है, जिसे शास्त्रों में ग्रहण दोष कहा गया है। यही कारण है कि 19 अक्टूबर को दोनों तिथियों को एक साथ नहीं मनाने की सलाह दी जा रही है।
आज तक की रिपोर्ट में भी यही गणना प्रकाशित हुई है, जिसमें ज्योतिष विद्वानों ने 18 और 19 अक्टूबर को लेकर उठी दुविधा का समाधान किया है।
सप्तमी, नवमी और व्रत का पारण: समय का ध्यान रखें
हिंदुस्तान समाचार पत्र के अनुसार सप्तमी तिथि 17 अक्टूबर, शनिवार को प्रातः 8:58 बजे से पूर्व ही पूजा पंडालों में देवी प्रतिमाओं का स्थापन कर लिया गया। शनिवार को सप्तमी का मान रहेगा और रविवार को सप्तमी तिथि प्रातः 5:53 बजे तक रहेगी, उसके बाद अष्टमी लग जाएगी।
महाष्टमी व्रत का पारण 19 अक्टूबर, सोमवार को प्रातः 7:53 बजे के बाद किया जाएगा, क्योंकि इसी समय नवमी तिथि आरंभ हो जाती है। अष्टमी तिथि में कन्या पूजन करने वाले श्रद्धालु 18 अक्टूबर को ही कन्या पूजन करेंगे।
जो भक्त नवमी तिथि में कन्या पूजन करना चाहते हैं, वे 19 अक्टूबर को प्रातः 7:53 बजे के बाद से 20 अक्टूबर, मंगलवार की प्रातः 9:35 बजे से पूर्व तक कन्या पूजन कर सकते हैं। नवमी तिथि 20 अक्टूबर को प्रातः 9:35 बजे तक ही व्याप्त रहेगी। इसी आधार पर महानवमी का व्रत 19 अक्टूबर को ही रखा जाएगा।
दशहरा कब मनेगा?
20 अक्टूबर, मंगलवार को प्रातः 9:35 बजे के बाद दशमी तिथि आरंभ हो जाएगी, इसलिए विजयदशमी का पर्व 20 अक्टूबर को मनाया जाएगा। जो श्रद्धालु नवरात्र के नौ दिनों का व्रत करते हैं, वे 20 अक्टूबर को प्रातः 9:35 बजे के बाद से शाम तक कभी भी पारण कर सकते हैं।
हमारी सभ्यता में समय की यह सूक्ष्म गणना केवल गणित नहीं है। वह श्रद्धा के साथ अनुशासन सिखाती है, जिसे सम्राट अशोक के काल से लेकर आज तक भारतीय जीवन में विशेष स्थान मिला हुआ है। तिथि का ध्यान रखकर व्रत करना आस्था की गरिमा और परंपरा के प्रति सम्मान का परिचायक है।
कन्या पूजन का महत्व और सही मुहूर्त
शारदीय नवरात्र में कन्या पूजन का विशेष महत्व है। नौ कन्याओं में नौ शक्तियों का वास माना जाता है। इस वर्ष अष्टमी वाले कन्या पूजन के लिए 18 अक्टूबर और नवमी वाले कन्या पूजन के लिए 19 अक्टूबर का दिन निर्धारित हुआ है। ज्योतिर्विद त्रिपाठी के अनुसार दोनों दिनों को मिलाकर एक ही दिन पूजा करना शास्त्रों की दृष्टि से उचित नहीं होगा।
श्रद्धालुओं को चाहिए कि वे अपने स्थानीय पंचांग और क्षेत्र के विद्वानों से भी परामर्श कर लें, क्योंकि भारत के विभिन्न क्षेत्रों में तिथि निर्णय की परंपराओं में हल्का अंतर हो सकता है। आस्था के इस पर्व में एकता और सद्भाव के साथ उपवास, पूजा और कन्या पूजन करना ही इस अवसर की सार्थकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
शारदीय नवरात्र 2026 में महाष्टमी का व्रत कब है?
महाष्टमी का व्रत 18 अक्टूबर, रविवार को रखा जाएगा। अष्टमी तिथि 18 अक्टूबर को प्रातः 5:53 बजे से आरंभ होकर 19 अक्टूबर को प्रातः 7:53 बजे तक रहेगी।
क्या अष्टमी और नवमी को 19 अक्टूबर को एक साथ मना सकते हैं?
ज्योतिर्विद दिवाकर त्रिपाठी ने समझाया कि ऐसा करने पर राहु और सूर्य का योग बनता है, जिसे ग्रहण दोष कहा जाता है। इसलिए अष्टमी 18 अक्टूबर को और नवमी 19 अक्टूबर को मनाना उचित है।
महानवमी का व्रत कब रखें और कन्या पूजन का समय क्या है?
महानवमी का व्रत 19 अक्टूबर, सोमवार को रखा जाएगा। नवमी तिथि में कन्या पूजन 19 अक्टूबर को प्रातः 7:53 बजे के बाद से 20 अक्टूबर की प्रातः 9:35 बजे से पूर्व किया जा सकता है।
विजयदशमी का पर्व किस दिन मनाया जाएगा?
दशमी तिथि 20 अक्टूबर, मंगलवार को प्रातः 9:35 बजे के बाद आरंभ होगी, इसलिए दशहरा 20 अक्टूबर को मनाया जाएगा।
